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  • बीकानेर के डॉ. नंद किशोर आचार्य केन्द्रीय नाटक अकादमी से सम्मानित पुरस्कृत नगर के इकलौते नाटककार हैं।

बीकानेर के डॉ. नंद किशोर आचार्य केन्द्रीय नाटक अकादमी से सम्मानित पुरस्कृत नगर के इकलौते नाटककार हैं।

3 वर्ष पहले
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ये दोस्ती .. हम नहीं तोड़ेंगे

हे मेरे फेसबुकिये मित्रो ! कब तक धमकाते रहोगे आप मुझे ? जब देखूं , तब धमकी । दो-चार दिन हुए नहीं कि फेसबुक पर पोस्ट चेप देते हो - टैग करने वाले मित्र सावधान ....टैग किया तो अमित्र यानी अनफ्रेंड करने को विवश होना पड़ेगा। आप अपने भाव बढ़ाने के लिए ऐसी धमकियां देते हैं, यह मैं जानता हूं । सच में नाराज होते तो कभी का अनफ्रेंड कर देते । फिर भी बता दूं कि आप धमकियां देते रहें किंतु मैं आपका साथ कभी नहीं छोडूंगा। साफ कहे देता हूं । मैं आपकी तरह ‘ एकला चलो रे ‘ सिद्धांत को मानने वाला नहीं हूं । मैं यार-बाज हूं । मित्रों को साथ लेकर चलता हूं और चलता रहूंगा ।

मुझे धमकाने से पहले ज्ञानी- ध्यानी महापुरुषों के अमृत वचनों को तो पढ़िए। वे कहते रहे हैं कि अच्छा मित्र वह होता है जो सार्वजनिक रूप से अपने मित्र की अच्छाइयां बताते हुए उस की मुक्तकंठ से सराहना करता है और उसकी कमियों को एकांत में अकेले में बताता है ताकि वह अपने में सुधार कर सके । यदि आप अच्छे मित्र हो तो मेरे द्वारा चेपी पोस्ट को लाइक करो , तारीफ के कमेंट करो, मेरा हौसला बढ़ाओ ताकि मैं ज्यादा से ज्यादा पोस्ट चेपूं और सबमें आपको टैग करता रहूं । यदि मेरी पोस्ट में कमी है तो सार्वजनिक रूप से अमित्र या अनफ्रेंड करने की धमकी देने की जगह सबसे अच्छे दोस्त की तरह मुझे एकांत में समझाओ ना एफबी इनबॉक्स में । यह ऐसा एकांत कक्ष है कि उसकी दीवारों के कान भी नहीं होते। इस कक्ष में आकर मन की बात बताओ न । किंतु इस कक्ष में तो, जो आपको घास नहीं डालती/ डालते उन मित्रों को आमंत्रित करने की असफल कोशिश में नींद बेचकर ओझका लेते रहते हो । मेरे जैसे से उस एकांत कक्ष में बात करने की आपको फुर्सत ही कहां है । देखो मित्रों, मैं पूरा सात्विक- आध्यात्मिक ( ‘ धार्मिक ‘ की जगह ‘आध्यात्मिक ‘ शब्द प्रभावी होने से प्रयोग किया है ) प्राणी हूं । मात्र 108 मित्रों को टैग करता हूं । न ज्यादा , न कम । माला के मनके हैं आप। तीन हजार से अधिक मित्रों की भीड़ में आपका चयन ...। मित्रता का पलड़ा भारी होने से ही तो आपको टैग करता हूं । आपको तो गर्वित -हर्षित होना चाहिए टैग होकर । वैसे आभासी दुनिया में मित्रों की कमी नहीं है । और बना लूंगा । दिन में दस- बारह विदेशी बालाओं की फ्रेंड रिक्वेस्ट आती हैं। मेरे से भी, जो वय में वरिष्ठ हैं , उनकी पहले से फ्रेंड हैं वे । भाषा की प्रॉब्लम होने से चैटिंग में पूरा रस नहीं आ पाएगा, यही सोच कर पेंडिंग रख रखी है ।

अब आप भी मेरी घोषणा सुन लीजिए । मैं टैगिया हूं ... आपको टैग करता हूं ... करता रहूंगा । क्योंकि आप मेरे दोस्त हैं और दोस्तों का साथ मैं कभी नहीं छोड़ सकता -

ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे / जब तक हैं फेसबुक पर / टैग करना नहीं छोड़ेंगे ।

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बुलाकी शर्मा

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बीकानेर

गुरुवार

17 मई 2018

फिलर नहीं, पिलर बनना है लघुकथा को

आज हिन्दी साहित्य में लघुकथा एक समृद्ध विधा के रूप में उभर कर आ रही है। लघुकथा आकारगत लघु हो सकती है लेकिन उसका उद्देश्य विशाल है । हम कह सकते हैं कि लघुकथा जीवन खंड के किसी विशेष क्षण की तात्कालिक अभिव्यक्ति है या फिर यूं कहें कि लघुकथा क्षण में छिपे जीवन की विराट अभिव्यक्ति है।

लघुकथा में गंभीरता, यथार्थपरकता, स्पष्टता, सूक्ष्मता, प्रखरता आदि विशेषताएं दृष्टि गोचर होती हैं । भाषा की सादगी, कसावट, सूक्ष्मता और स्वाभाविकता के साथ अर्थगांभीर्य लघुकथा के कलात्मक रूप की महती आवश्यकता है।

जब कोई लेखक लघुकथा या किसी भी विधा में लिखता है, तब ये प्रश्न उपस्थित होते हैं - क्या लिखना है? क्यों लिखना है? और कैसे लिखना है? यानी लघुकथा का कथानक, उद्देश्य और शिल्पगत सौन्दर्य उपर्युक्त तीनों बातों का आगाज लघुकथा में भी होना चाहिए। तभी वह अपने भाव और भाषिक सौन्दर्य को व्यक्त कर पायेगी।

लेकिन आज लघुकथा का रूप खत्म होता जा रहा है आज सोशल मीडिया या वाट्सएप के माध्यम से जो लघुकथाएं आ रही हैं, वे बोध कथा के रूप में आ रही है। ऐसा लगता है कि लघुकथा एक फिलर की तरह बनती जा रही है। जहां मर्जी आये वो सब लिखा जा रहा है । कहीं की घटना कहीं जोडी जा रही है। लघुकथा का अपना एक वजूद है। एक शैली है। लघुकथा में जो सजगता होनी चाहिए, वो आजकल कम होती जा रही है। यह सही है कि सोशल मीडिया और इन्टरनेट के कारण लघुकथा लेखक और पाठकों की वृद्धि हुई है। लेकिन अन्धानुकरण के कारण यह अपना मूल रूप खोती जा रही है। यह एक लघु आकारीय विधा है। यह पूरी तरह तत्क्षण संप्रेषित हो जाती है। कहानी के लिए तो घटनाओं का अवकाश रहता है। मगर लघुकथा में घटना की प्रतिध्वनि मात्र ही होनी चाहिये। लघुकथा ज्ञान का विषय नहीं, ना ही किसी भाव या वस्तु का विश्लेषण है। वह तो एक इन्द्रधनुष के समान अपनी आभा को बिखेर कर पाठक को आह्लादित और आनंदित करती है। लघुकथा हमारी सामाजिक विद्रूपताओं पर करारा व्यंग्य करती हुई अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है। सुधि पाठकों और लेखकों का यह दायित्व बनता है कि लघुकथा के उस रूप में किसी प्रकार का परिर्वतन ना करें जिससे कि उसका मूल रूप ही गायब हो जाये । इतना विशाल लघुकथा का जो पिलर है वह फिलर के चक्कर में बिगड़े नहीं ।

लघु कथा

अन्नम परब्रह्म स्वरूपम् यानी अन्न भगवान का स्वरूप है बच्चो । तुम सब भी सदा इस बात का ख्याल रखो कि थाली में खाना झूठा न जाये । जरूरत के अनुसार ही लेना चाहिए । विद्यार्थियों को यह पाठ पढ़ाती सविता कक्षा से बाहर निकली। वहीं से निकल रही साथी अध्यापिका निशा ने भी सुना । शाम को किसी शादी कार्यक्रम में शरीक होने गयी सविता पर निशा की नजर पड़ी । औपचारिकतावश उससे हाई-हेल्लो की और साथ ही प्लेट में खाना लेने चल पड़ी । खाने के मेनु में शामिल सभी व्यंजनों से सविता ने पूरी प्लेट को भर लिया । सविता और निशा पास पास खड़ी हो कर खाने लगीं । खा चुकने के बाद सविता पास ही रखे कचरापात्र में लगभग आधी से ज्यादा भरी प्लेट डालने लगी। ये देख साथ खड़ी निशा ने टोका- अरे सवि! ये तुम इतना वेस्ट क्यूं छोड़ रही हो ? निशा को नजरअंदाज करती सविता सफाई में बोली - पार्टियों में यूं ही चलता है । - लेकिन क्लास में तो तुम बच्चों को खाना झूठा न छोड़ने की ... । सविता ने निशा की बात बीच में ही काटते हंसते कहा - वो तो क्लास की बात थी ... ।

सुधा सारस्वत

वर्तमान में भी चैलेंज है एब्सर्ड नाटक का मंचन

दूसरे विश्व युद्ध के पश्चात यूरोप में सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों ने समाज को बहुत गहरे से प्रभावित किया। सांस्कृतिक तौर पर चेतना और अभिव्यक्ति का प्रारम्भ 1950 में। एब्सर्ड थियेटर या ऊलजलूल या बेतुका रंगमंच के रूप में हुआ। सांस्कृतिक चेतना और अभिव्यक्ति में बंधे बंधाए घेरों को तोडने की दिशा में। एब्सर्ड थियेटर का विशेष परन्तु सीमित स्थान रहा है। एब्सर्ड रंगमंच या ऊलजलूल नाटकों के यूरोप में कुछ लेखक रहे हैं, अपने समय में - सैमुअल बैकेट तथा आइजेन आइनेस्को, जिनका पहला एबसर्ड नाटक - बाल्ड सोपर्नो था। इस नाटक ने विश्व में अपनी मुक्कमल पहचान बनाई। उनमें से सैमुअल बैकेट का नाटक वेटिंग फॉर गोडो अपनी संवाद लयात्मकता, शिल्प और कथानक तथा आध्ुानिक जीवन की अर्थहीनता को एक अलग दृष्टि देने के कारण वैश्विक स्तर पर वैचारिक रूप से तो चर्चित रहा पर व्यापक तौर पर रंगमंच पर अपना अलग अस्तित्व खड़ा नहीं कर पाया।

बीकानेर में रंगन द्वारा 1977-78 में वेटिंग फॉर गोडो का मंचन-वागीश कुमार सिंह के निर्देशन में हुआ, तब वे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में अध्ययनरत थे। इस नाटक में कैलाश भारद्वाज और ओम थानवी के लयात्मक संवाद प्रेषण ने पूरे नाटक को लगभग 3 घंटे तक बांधे रखा वहीं लक्की की भूमिका में विनोद भटनागर ने। कौशल सिंह का अभिनय भी प्रभावी रहा। बहरहाल इस नाटक का सकारात्मक अधिक और दुराग्रहपूर्ण पर नकारात्मक प्रभाव कम रहा। हनुमान पारीक के निर्देशन में जहीर रिजवान उस्मान के नाटक, डॉ. राजानंद द्वारा लिखित निर्देशित नाटक भी एब्सर्ड नाटक मानते मंचित किए गए किन्तु वे इस पश्चिमी शैली का सफलता से निर्वहन नहीं किया जा सका। क्रमबद्ध कथा न होने से एब्सड्र नाटकों का मंचन आज भी लेखक निर्देश और अभिनेता के लिए चैलेंज है।

ओम सोनी

शब्दरंग

यूं ही चलता है

लघुकथा में घटना की प्रतिध्वनि मात्र ही होनी चाहिए। लघु कथा ज्ञान का विषय नहीं ना ही किसी भाव या वस्तु का विश्लेषण है।

नगेन्द्र किराडू

कहना तो पड़ेगा

मायड़ भाषा

आज आजादी रै इत्ता सालां बाद भी राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मानता नीं मिलणो घणै दु:ख री बात है।पण इण भाषा नै मानता नीं मिलण रो कारण आपां खुद ही हाँ । आज आपां आपणै टाबरां नै अंग्रेजी अर हिंदी भाषा तो सिखावां पण राजस्थानी भाषा में आपां वां साम्ही बात कोनी करां, जिणसूं बे आज आपरी मायड़ भाषा स्यू दूर हो रैया है अर वांनै इण भाषा स्यू अपणायत अर लगाव नीं होय रैयो है । आज आपां सगळा नै राजस्थानी भाषा नै आपरी ठावी ठोड़ दिरावण सारू आम लोगां माय इण नै बधापो देवण खातर घर घर अलख जगावण री जरूरत है । सगळां नै बतावां के राजस्थानी भाषा नै संवैधानिक मान्यता नीं मिलण सूं राजस्थान रा युवा प्रतियोगी परीक्षावां में लारै रैय रिया है । दूजै प्रदेसां रा अठै रैवणिया लोग आपाणै हक रो लाभ उठा रिया है। जद राजस्थान रो बच्चो - बच्चो आ बात समझेला तद ई आपांरी मायड़ भाषा आपरी ठावी ठौड़ पावेला।

मुकेश रामावत

प्रतियोगी परीक्षावां में आपां लारै क्यूं

बीकानेर में पहली बार पूर्णत: मौलिक एवं अप्रकाशित साहित्यिक रचनाएं, व्यंग्य, स्मृतियां सिर्फ भास्कर में...

नई पुस्तकें

मैनेजमेंट शिक्षा के क्षेत्र में डॉ गौरव बिस्सा की विशेष पहचान है । व्यक्तित्व विकास और मोटिवेशन से संबंधित उनकी अनेक पुस्तकें प्रकाशित हैं । सद्यः प्रकाशित पुस्तक ‘ व्यक्तित्व नवसृजन सूत्र ‘ में उनके प्रेरणास्पद 49 निबंध हैं । भगवान श्रीकृष्ण को वे दुनिया का सबसे बड़ा मैनेजमेंट गुरु मानते हैं । रोचक, प्रभावी कथात्मक शैली में लिखित इन निबंधों में व्यक्तित्व विकास के सिद्धांतों , सकारात्मक सोच , अंतर्मन की अद्भुत शक्ति , समय प्रबंधन आदि के बारे में प्रभावी ढंग से बताया गया है , जो पाठकों को नई सोच के साथ सकारात्मक भाव से आगे बढ़ते हुए दृढ़ता से लक्ष्य प्राप्ति हेतु प्रेरित करते हैं । युवाओं के साथ सबके लिये यह पुस्तक उपयोगी है ।

प्राचीन काल में जांगल देश के रूप में विख्यात हमारा शहर बीकानेर राजस्थान के प्राचीनतम शहरों में से एक है । सर्वधर्म समभाव, भाईचारा, आत्मीयता , गंगा-जमुनी संस्कृति के मूर्त स्वरूप इस शहर की स्थापना से लेकर आज तक के विकास और बदलाव को प्रोफेसर हरिराम गुप्ता ने ‘ बीकानेर नगर का स्वर्णिम इतिहास एवं विकास ‘ पुस्तक में बहुत ही अच्छी तरह से प्रस्तुत किया है । इस पुस्तक में शहर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ ही यहां के प्रमुख होटल, हवाई- रेलवे- रोडवेज की समय सारणी ,निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की जानकारी सहित अनेक महत्वपूर्ण बिंदुओं को लिया गया है । निश्चय ही यह पुस्तक बीकानेर को जानने के लिए उपयोगी और संग्रहणीय है।

कविता

मुझसे मेरी

एक मुट्ठी हरियाली छिन गई

प्रगति के बुलडोजर ने

तोड़ दिया मेरा घर

मैं और मेरा परिवार

भूखा प्यासा बेघर

दिला सकता है तो

मुझे न्याय दिला विधाता

इतनी विशाल धरा पर

वृक्ष की एक डाली पर

बसेरा दिला

पंखों की उड़ान से थक कर

शाम को बैठकर वहां सुस्ता सकूं

अपने परिवार और बच्चों के साथ रह सकूं

न्याय कर सकोगे विधाता !

-रेखा पांडिया

पुस्तक : व्यक्तित्व नवसृजन सूत्र

लेखक : डॉ गौरव बिस्सा

प्रकाशक : कलासन प्रकाशन बीकानेर

संस्करण : 2018 मूल्य : Rs. 250

पुस्तक : बीकानेर नगर का स्वर्णिम इतिहास एवं विकास

लेखक : प्रोफेसर हरिराम गुप्ता

प्रकाशक : कलासन प्रकाशन बीकानेर

संस्करण : 2016 मूल्य : Rs. 150

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न्याय कर सकोगे विधाता !

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