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प्रजेंटेशन में जोहड़-टांका-जैतून के इनोवेशन, सीएम बोली-इनसे सीखें

3 वर्ष पहले
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पानी के लिए आत्मनिर्भर बनाने की योजना मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान में बीकानेर जिले ने समय पर काम करने के साथ इनोवेशन और कांबीनेशन का अनूठा उदाहरण पेश किया। नतीजा, प्रदेशभर से चुने गए तीन श्रेष्ठ जिलों में दूसरा नंबर बीकानेर का रहा है। मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे, ग्रामीण विकास पंचायती राज मंत्री राजेन्द्र राठौड़ ने इसके लिए बीकानेर कलेक्टर एन.के.गुप्ता को सम्मानित किया।

जयपुर के दुर्गापुरा स्थित कृषि प्रबंध अनुसंधान संस्थान में शुक्रवार को हुई जल स्वावलंबन कार्यशाला के दौरान यह सम्मान दिया गया। मुख्य सचिव डी.बी.गुप्ता सहित प्रदेशभर के प्रमुख अधिकारियों, मंत्रियों आदि की मौजूदगी में हुए समारोह के दौरान ओवरऑल परफॉरमेंस के लिए बीकानेर के जलग्रहण अधीक्षण अभियंता भागीरथ बिश्नोई और बेस्ट परफॉर्मिंग ब्लॉक की श्रेणी में एईएन राघवेन्द्र बीका को भी सम्मानित किया गया।

बीकानेर को मिले इन अवार्ड की मुख्य वजह जोहड़, टांका के काम समय पर पूरे करने के साथ ही इनमें किए गए इनोवेशन को माना गया। इसके साथ ही 470 खेतों में जैतून के 10-10 पौधे लगाने को भी इस इनोवेशन से जोड़ा गया। कलेक्टर गुप्ता ने अपने प्रजेंटेशन में भी इन तथ्यों को शामिल किया। जिला कलेक्टर श्रेणी के पुरस्कारों में झालावाड़ पहले और नागौर तीसरे स्थान पर हैं।

जल स्वावलंबन में झालावाड़ पहले, बीकानेर दूसरे और नागौर तीसरे स्थान पर, कलेक्टर एन.के.गुप्ता ने मुख्यमंत्री राजे, मंत्री राठौड़ के हाथों लिया अवार्ड, ओवरऑल परफॉरमेंस के लिए एसई भागीरथ बिश्नोई, बेस्ट परफॉर्मिंग ब्लॉक के लिए एईएन राघवेन्द्र बीका भी पुरस्कृत

बीकानेर में इतना काम

बीकानेर के ये तीन इनोवेशन

फेंसिंग वाला जोहड़, पशुओं के लिए अलग पुली-खेळी : परंपरागत जोहड़ में पशुओं के आने से पानी गंदा हो जाता है और इंसानों के पीने लायक नहीं रहता। श्रीडूंगरगढ़ में फेंसिंग वाला ऐसा जोहड़ बनाया जहां पशु सीधे नहीं पहुंच सकते। इससे इतर पशुओं के लिए अलग से पुली लगाई गई जिससे एक खेळी यानी कुंडी में पानी पहुंचता है और वे अपनी प्यास बुझा सकते हैं।

टांके में भी स्वच्छता : सामान्यतया टांका बनाकर उसके चारों तरफ पक्की ढलान यानी आगोर बना दी जाती है। ऐसे में पानी लेने के लिए टांके तक जाने वाले लोगों को इस आगोर से गुजरना पड़ता है। छोटे-बड़े पशु भी यहां तक पहुंचते हैं। स्वाभाविक है पानी प्रदूषित और गंदा होता है। इससे बचने के लिए ढलान की खास डिजाइन करते हुए टांके तक इंसानी पहुंच का अगल रास्ता बना उसे बाउंड्री में कवर किया।

जैतून फार्मिंग : जल स्वावलंबन का ही हिस्सा रहे पौधरोपण में विदेशी पौधे जैतून के प्लांटेशन की योजना बनी। इसमें 470 किसानों के खेतों में 10-10 पौधे लगाए। हालांकि जैतून की खेती को सरकार प्रोत्साहित कर रही है लेकिन परंपरागत किसानों का झुकाव अभी इस तरफ नहीं है। ऐसे में जिले के 470 खेतों में इसकी बढ़त और पांच साल में पैदावार देखने से इस कैश क्रॉप की तरफ रुझान बढ़ेगा।

15 जोहड़ बीते साल बने

12 जोहड़ बन रहे फेज-थ्री में

3500 टांके पहले बनाए गए

4500 टांके बनाने हैं इस बार

फेंसिंग वाला जोहड़, पशुओं के लिए अलग पुली-खेळी : परंपरागत जोहड़ में पशुओं के आने से पानी गंदा हो जाता है और इंसानों के पीने लायक नहीं रहता। श्रीडूंगरगढ़ में फेंसिंग वाला ऐसा जोहड़ बनाया जहां पशु सीधे नहीं पहुंच सकते। इससे इतर पशुओं के लिए अलग से पुली लगाई गई जिससे एक खेळी यानी कुंडी में पानी पहुंचता है और वे अपनी प्यास बुझा सकते हैं।

टांके में भी स्वच्छता : सामान्यतया टांका बनाकर उसके चारों तरफ पक्की ढलान यानी आगोर बना दी जाती है। ऐसे में पानी लेने के लिए टांके तक जाने वाले लोगों को इस आगोर से गुजरना पड़ता है। छोटे-बड़े पशु भी यहां तक पहुंचते हैं। स्वाभाविक है पानी प्रदूषित और गंदा होता है। इससे बचने के लिए ढलान की खास डिजाइन करते हुए टांके तक इंसानी पहुंच का अगल रास्ता बना उसे बाउंड्री में कवर किया।

जैतून फार्मिंग : जल स्वावलंबन का ही हिस्सा रहे पौधरोपण में विदेशी पौधे जैतून के प्लांटेशन की योजना बनी। इसमें 470 किसानों के खेतों में 10-10 पौधे लगाए। हालांकि जैतून की खेती को सरकार प्रोत्साहित कर रही है लेकिन परंपरागत किसानों का झुकाव अभी इस तरफ नहीं है। ऐसे में जिले के 470 खेतों में इसकी बढ़त और पांच साल में पैदावार देखने से इस कैश क्रॉप की तरफ रुझान बढ़ेगा।

फेंसिंग वाला जोहड़, पशुओं के लिए अलग पुली-खेळी : परंपरागत जोहड़ में पशुओं के आने से पानी गंदा हो जाता है और इंसानों के पीने लायक नहीं रहता। श्रीडूंगरगढ़ में फेंसिंग वाला ऐसा जोहड़ बनाया जहां पशु सीधे नहीं पहुंच सकते। इससे इतर पशुओं के लिए अलग से पुली लगाई गई जिससे एक खेळी यानी कुंडी में पानी पहुंचता है और वे अपनी प्यास बुझा सकते हैं।

टांके में भी स्वच्छता : सामान्यतया टांका बनाकर उसके चारों तरफ पक्की ढलान यानी आगोर बना दी जाती है। ऐसे में पानी लेने के लिए टांके तक जाने वाले लोगों को इस आगोर से गुजरना पड़ता है। छोटे-बड़े पशु भी यहां तक पहुंचते हैं। स्वाभाविक है पानी प्रदूषित और गंदा होता है। इससे बचने के लिए ढलान की खास डिजाइन करते हुए टांके तक इंसानी पहुंच का अगल रास्ता बना उसे बाउंड्री में कवर किया।

जैतून फार्मिंग : जल स्वावलंबन का ही हिस्सा रहे पौधरोपण में विदेशी पौधे जैतून के प्लांटेशन की योजना बनी। इसमें 470 किसानों के खेतों में 10-10 पौधे लगाए। हालांकि जैतून की खेती को सरकार प्रोत्साहित कर रही है लेकिन परंपरागत किसानों का झुकाव अभी इस तरफ नहीं है। ऐसे में जिले के 470 खेतों में इसकी बढ़त और पांच साल में पैदावार देखने से इस कैश क्रॉप की तरफ रुझान बढ़ेगा।

यह बोली सीएम राजे

जिस इलाके को अकाल और सूखे के कारण जाना जाता था आज वहां सफल हुए जल संरक्षण के काम देश-दुनिया के लिए नजीर बन रहे हैं। बीकानेर, झालावाड़, नागौर में ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने यह दिखाया है कि टीमवर्क और बेहतर प्लानिंग से हम जल की दिशा में आत्मनिर्भर हो सकते हैं। जिला कलेक्टरों के सफल नवाचारों को प्रदेश के अन्य स्थानों पर भी अपनाएं।

और बेहतर करेगी टीम बीकानेर : गुप्ता

कलेक्टर एन.के.गुप्ता का कहना है, यह टीम वर्क का परिणाम है। पुरस्कार से प्रोत्साहन तो मिलता ही है अब टीम बीकानेर और बेहतर करने का प्रयास करेगी। इनोवेशन के साथ समयबद्ध काम करने और बेहतर कांबीनेशन ने यह मुकाम दिलाया।

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