इन दोनों ही घटनाओं का मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा जिसने कांग्रेस नेतृत्व तथा राष्ट्रवादियों की सोच में जबर्दस्त बदलाव ला दिया, जिससे राजशाही के प्रति उनके चले आ रहे चिंतन में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगे। इन दोनों घटनाओं ने एक ओर कांग्रेस के तथा दूसरी ओर राज्यों के जनप्रतिनिधियों के दृष्टिकोण में बदलाव लाना शुरू कर दिया और उनकी वह सहानुभूति एवं सदभावना, जो राजतंत्र के प्रति थी, वह समाप्त होनी शुरू हो गई। कांग्रेस के हरिपुरा अधिवेशन से कुछ दिन पहले सन् 1938 में ही, नवसारी में अखिल भारतीय देशी राज्य लोक परिषद ने कांग्रेस द्वारा प्रांतीय समितियों पर राज्यों की आंतरिक गतिविधियों में भाग लेने संबंधी प्रतिबंध समाप्त करने का अनुरोध किया। इसी बीच कांग्रेस प्रांतीय समिति के कार्यकर्ताओं को मैसूर राज्य में बंदी बना लिया गया, परिणामस्वरूप कांग्रेस ने फरवरी, सन् 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में भारतीय राज्यों के संबंध में एक विस्तृत प्रस्ताव पारित किया, जिसमें भारतीय राज्यों की प्रजा के लिए सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक क्षेत्रों में वैसी ही स्वतंत्रता की अपेक्षा की गई, जैसी ब्रिटिश इंडिया में उपलब्ध थी।
यह प्रस्ताव अन्य राज्यों की तरह समसामयिक बीकानेर राज्य की प्रजा के लिए भी प्रभावी था। इस प्रस्ताव में भारतीय राज्यों को भारत का अभिन्न अंग घोषित किया गया। भारतीय राज्यों में पूर्ण उत्तरदायी शासन और नागरिक अधिकारों की पूर्ण सुरक्षा के अपने लक्ष्य को कांग्रेस ने स्पष्ट किया। (लगातार)