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रेंजर की नौकरी छोड़ शुरू की प्राकृतिक खेती

3 वर्ष पहले
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दीपेन्द्र शुक्ला | बिलासपुर

रेंजर की नौकरी छोड़कर प्राकृतिक खेती शुरू करने वाले अजयपुर नेवरा के संजय दिघ्रष्कर को एक साल में ही सफलता मिलनी शुरू हो गई। उन्होंने अपने 19 एकड़ के खेत में से महज 40 डिसमिल में रवि फसल से खेती की शुरुआत की। इस दौरान महज 6 किलो बीज से 248 किलो अनाज का उत्पादन लिया। इस दौरान खेत में दो प्रकार बंशी और लोकेमैन-1 गेहूं, धनिया, सरसों, चना और मेथी की फसल लगाई थी।

अक्टूबर 2017 में संजय को प्राकृतिक खेती के बारे में इंटरनेट से पता चला। जानकारी जुटाने के दौरान उन्हें आंध्रप्रदेश के कृषि विशेषज्ञ व शून्य बजट आध्यात्मिक कृषि करने वाले सुभाष पालेकर के बारे में जानकारी मिली। संजय ने उनसे संपर्क किया तो उन्होंने अपनी लिखी हुई किताबें और प्राकृतिक खेती के बारे में बनाया वीडियो उपलब्ध कराया। संजय ने बताया कि इसे देखकर ही मैंने खेती शुरू की। पहले ही सीजन की फसल में फायदा हुआ है। उन्होंने बताया कि फसल से ज्यादा उनकी भूमि को फायदा हुआ है। इससे शून्य बजट खेती करना आगे आसान होगा। अब पूरे खेत में इस विधि का उपयोग करेंगे। उन्होंने बताया कि वे जल्द ही समूह बनाकर प्राकृतिक खेती से लोगों को अवगत कराएंगे।

40 डिसमिल में रबी फसल से खेती की शुरुआत, गेहूं, धनिया, सरसों, चना और मेथी का उत्पादन लिया

नागपुर से लाए थे 1 किलो गेहूं

नागपुर काम से गए थे। वहां बहुत ही स्वादिष्ट रोटी खाने में मिली। पता करने पर बंशी गेहूं के बारे में जानकारी मिली। खोजबीन के बाद 1 किलो बीज मिला। इसे लेकर आए और अपने खेत में लगाया। इससे 50 किलो उत्पादन हुआ। बंशी गेहूं के साथ में ही डेढ़ किलो लोकेमैन गेहूं से 50 किलो, डेढ़ किलो चना से 45 किलो, 1 किलो धनिया से 10 किलो, 1 किलो मेथी से 45 किलो, और 50 ग्राम सरसों से 5 किलो उत्पादन हुआ। सीजन के दौरान 28 किग्रा हरा धनिया और 20 किलो हरी मेथी बेची गई।

किराए से देते थे भूमि को

संजय की प|ी दंतेवाड़ा में महिला एवं बाल विकास विभाग में सुपरवाइजर हैं। वे अपनी भूमि को किराए पर दिए हुए थे। नौकरी में ट्रांसफर के चक्कर को देखते हुए उन्होंने नौकरी छोड़ कर खुद खेती करना शुरू कर दिया। आगे विलुप्त होते बीजों का संरक्षण कर रहे हैं।

आग से खत्म हो रही उर्वरा

किसान खेती करने के बाद निकलने वाले खरपतवार को जला देते हैं। यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के साथ ही खेती की उर्वरा शक्ति को भी खत्म कर देता है। यहां के खेतों में कार्बन की मात्रा नहीं है, इस कारण भी खेती करना महंगा हो गया है।

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