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जीवन में भक्ति के बिना ज्ञान व वैराग्य भी सार्थक नहीं होते: डॉ. लक्ष्मण

3 वर्ष पहले
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भक्ति, ज्ञान व वैराग्य जीवन में जरूरी है। भक्ति को ज्ञान और वैराग्य की मां कहा जाता है। जब तक भक्ति नहीं आती तब तक जीवन में ज्ञान और वैराग्य सार्थक नहीं होते। भक्ति श्रीमद् भागवत कथा से आती है। उक्त बातें गोंड़पारा स्थिति सीता-राम मंदिर में रविवार को शुरू हुए श्रीमद् भागवत कथा के पहले दिन व्यासपीठ से वेदांताचार्य डॉ. लक्ष्मण शरण महाराज ने कही।

डॉ. शरण ने बताया कि पुरुषोत्तम मास परम पावन समय है। यह साक्षात परमात्मा का स्वरूप है। इस समय किए गए भजन-कीर्तन का अनंत फल मिलता है। पुरुषोत्तम मास पर गोंड़पारा स्थित सीता-राम मंदिर में श्रीमद् भागवत सप्ताह शुभारंभ किया गया। यह 27 मई तक चलेगी। सुबह श्रीमद् भागवत यज्ञ हुआ। इसमें सभी देवताओं का आह्वान किया गया। इसके बाद राधा-कृष्ण की 16 प्रकार से पूजा की गई। फिर श्रीमद् भागवत सुखदेव का पूजन हुआ। पूजन के बाद बाजे के साथ श्रीमद् भागवत को व्यासपीठ पर स्थापित किया गया। वहीं शाम को श्रीमद् भागवत कथा का शुभारंभ हुआ। वेदांताचार्य डॉ. शरण ने भक्ति, ज्ञान व वैराग्य का प्रसंग सुनाया। इसके बाद उन्होंने बताया कि धुंधकारी अच्छा नहीं रहता है। मोह और आशक्ति के बंधन में जीव भगवान की शरण में नहीं पहुंच पाता है। जब गौकरण द्वारा धुंधकारी को श्रीमद् भागवत की कथा सुनाई जाती है, इसके बाद धुंधकारी को प्रेत योनि से मुक्ति मिलती है। श्रीमद् भागवत पाप, दुख व कष्टों से मुक्ति दिलाता है। डॉ. शरण ने भागवत कथा कैसे हुआ, राजा परीक्षित की कथा सुनाकर बताई।

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