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शरीर की अपेक्षा आत्मा का ध्यान रखना चाहिए: मुनि पंथक

3 वर्ष पहले
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गुजराती जैन भवन में कार्यक्रम चल रहा है। मुनि पंथक महाराज ने कहा कि किसी भी प्रकार की घटना, वस्तु या तो कोई भी पर्याय की अंदर गर्भित रही हुई विभिन्नता की जानकारी समझदारी को भेदभाव करता है। वही दृष्टिकोण को अगर हम अधिक चिंतन करें तो मालूम पड़ेगा कि प्रत्येक जीव शरीर और आत्मा का धारक है। एकदम मिलाजुला है।

जो जीव सम्यक ज्ञान से अज्ञान है। वह जीव आत्मा और शरीर को एक ही समझते हैं। शरीर को ही सर्वे सर्वा और सब कुछ समझता है। शरीर को ठीक-ठाक रखने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। अपने शरीर की हिफाजत के लिए वह दूसरे जीवों का प्राण लेने को भी हमेशा तत्पर रहता है। लेकिन ऐसा जीव आत्मा को अस्तित्व को बिल्कुल बस में कर देता है। आत्मा की बिल्कुल देखभाल करता नहीं है। आत्मा की बदौलत यह शरीर है। अज्ञानता के कारण ऐसे लोग गलत कर्म का बंधन करते हैं और संसार में भटकते हैं। समझाया कि मनुष्य योनि का शरीर इतना ही मूल्यवान उपयोगी और जरूरी भी है अगर कि उसका उपयोग आत्मा के उत्थान के लिए ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, प्रेम, अहिंसा, करुणा, सेवा जैसे प्रवृत्तियों में उपयोग में लिया जाना चाहिए। ज्यादा से ज्यादा अच्छे कर्म करना चाहिए। जीवों की हत्या जाने-अनजाने में हो उसे रोकना चाहिए।

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