गांव के सरकारी स्कूल में स्मार्ट क्लास और अंग्रेजी की ट्रेनिंग
खरगहनी प्रायमरी स्कूल में शिक्षक खुद की कोशिशों से गरीब आदिवासी बच्चों के लिए वे तमाम सुविधाओं से शिक्षा दे रहें हैं जो प्राइवेट स्कूल में मिलती हैं। स्मार्ट क्लास, क्लास वन में अंग्रेजी शिक्षा, आर्ट्स व क्राफ्ट की शिक्षा, कबाड़ के सामानों से उपकरण बनाकर गणित और विज्ञान की शिक्षा के अलावा जिन बच्चों के पास पुस्तक कापियां नहीं होती उन्हें वे जनसहयोग से मिली सामग्रियों से मुफ्त में उपलब्ध कराते हैं।
बिलासपुर से 25 किलोमीटर की दूरी पर पथर्रा के पास खरगहनी प्रायमरी स्कूल में शिक्षकों की ओर से ऐसी ही कोशिशें हो रही हैं। यहां के शिक्षकों में प्रधान पाठक पुष्पेंद्र गुप्ता, ललित राजपूत, अड़ानंद कौशिक और दीप्ति दीक्षित के पढ़ाने का तरीका भी दूसरी स्कूलों से भिन्न है। यहां एक शिक्षक एक ही क्लास को नहीं पढ़ाता बल्कि विषय के हिसाब से सभी क्लास को पढ़ाता है जिससे कि गुणवत्ता बरकरार रहे। स्कूल में बच्चों की दर्ज संख्या 104 है जिसमें अधिकांश गरीबी रेखा के नीचे आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के बच्चे हैं। इनमें कुछ ऐसे बच्चे भी हैं जिनके माता-पिता नहीं है और वे दूसरों के यहां रहकर स्कूल पढ़ने आते हैं। शिक्षकों का कहना है कि उनकी पहल सार्थक होगी यदि बाकी सरकारी स्कूल भी इसी तर्ज पर चलें।
जनसहयोग मिला तो शिक्षकों ने बच्चों के लिए पुस्तक- कापी भी खरीद कर निशुल्क बांटना शुरू किया, आदिवासी बच्चों को प्राइवेट स्कूल जैसी शिक्षा
खरगहनी प्रायमरी स्कूल में शिक्षिका मॉडल से बच्चों को जानकारी देते हुए।
क्लास वन में मिलती है अंग्रेजी शिक्षा
स्कूल में शिक्षकों ने जनसहयोग से वह सारी सुविधाएं जुटा लीं, जिनकी जरूरत गरीब बच्चों को थी। स्मार्ट क्लास के लिए एलईडी टीवी ली और बच्चों को शिक्षा देनी शुरू की। इसी तरह से पहली कक्षा के बच्चों को भी अंग्रेजी शिक्षा देना शुरू की। बेसिक शब्दों के साथ छोटे-छोटे वाक्यों को सिखाना शुरू किया। विभिन्न प्राइवेट स्कूलों की पुस्तकों का संकलन कर लाइब्रेरी भी बनाई।
जीवनदीप समिति ने गोद लिया 104 बच्चों को
पिछले दिनों जीवन दीप समिति ने खरगहनी स्कूल जाकर गरीब आदिवासी बच्चों को साबुन, कंपास किट, स्कूल बैग, पानी बॉटल, आईकार्ड, टाइ बेल्ट, रुमाल आदि बांटे। समिति के रविंद्र सिंह व अन्य साथियों ने वहां बच्चों को सफाई के बारे में समझाया और बारी-बारी से बच्चों के नाखून भी काटे। इतना ही नहीं समिति ने सभी 104 बच्चों को गोद भी लिया।