पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • बच्चों ने भी रोजे रखे, जुमे की नमाज में अच्छी बारिश और खुशहाली की दुआ

बच्चों ने भी रोजे रखे, जुमे की नमाज में अच्छी बारिश और खुशहाली की दुआ

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
शहर अौर देहात की मस्जिदों में शुक्रवार को अकीदतमंदों ने उत्साह के साथ रमजान माह के पहले जुमे की नमाज अदा की। शहर की छोटी-बड़ी 24 मस्जिदों में नमाज अदा की गई। मुस्लिम समाजजनों ने देश में खुशहाली, भाईचारे के साथ ही अच्छी बरसात के लिए दुआ की।

पहले रोजे पर सुबह 3 बजे उठकर नित्यकर्म से निबट कर रोजेदारों ने 4 बजे सहरी खत्म की। फज्र की नमाज अदा करने के बाद घरों पर कुरआन की तिलावत की गई तथा रोजेदार अपने काम-धंधे में जुट गए। दोपहर जोहर व असर की नमाज अदा की गई। इफ्तारी का सामान खरीदने रोजेदार बाजारों में निकल पड़े, फल, खजूर की खूब खरीदारी हुई। रमजान माह शुरू होते ही बाजारों में फल के दाम भी दोगुने हो गए। रोजे को लेकर बच्चे, बुजुर्ग में भारी गर्मी के बावजूद उत्साह रहा। मिस्त्री मार्केट और लाख-चूड़ी का काम करनेवाले भटि्टयों के आगे काम करते हुए भी रोजा रख रहे हैं।

मौलाना असलम ने बताया कि रहमत और बरकत के नजरिये से रमजान के महीने को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा हिस्सा मगफिरत का होता है। जिसमें अल्लाह अपने बंदों की मगफिरत करता है। तीसरे हिस्से में दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित करता है। रोजा गुनाहाें से दूर रखता है। देश या समाज के हालात कितने भी बदल जाएं, मजहब कभी नहीं बदलता। मजहबी बातों की सच्चाई लोगों को सही रास्ता दिखाती है। रोजा रखना इंसान को गुनाहों से दूर करता है। इससे रूह को नई ताकत मिलती है। शरीर और आत्मा शुद्ध होती है। व्यक्ति अल्लाह के करीब पहुंचता है। रोजा रखने से इंसान समर्पण भाव रखनेवाला हो जाता है। अल्लाह के प्रति डर उनके बताए रास्ते पर चलने की आदत, इबादत करने की चाह और गुनाहों से लड़ने की शक्ति आती है।

इस्लाम की बुनियादी तालीम का चौथा हिस्सा है रोजा: पूर्व शहर वक्फ कमेटी अध्यक्ष मौलाना असलम ने कहा कि रोजा अल्लाह की इबादत का एक तरीका है। इस्लाम की बुनियादी तालीम में चौथा हिस्सा रोजा है। पहला कलमा, दूसरा नमाज, तीसरा जकात, चौथा रोजा व पांचवां हज है। रोजा एक इबादत है, इस महीने में खुदा ने इंसानों को सीधा रास्ता दिखाने के लिए अपनी आखिरी किताब कुरआन-ए-पाक को नाजिल किया। जो दुनिया में रहकर, दुनिया तक इंसान की हिदायत के लिए रोशनी की मिनार है। रमजान में एक महीने तक रोजेदार की एक तरह से ट्रेनिंग हो जाती है, सुबह से शाम तक खाना-पीना और अपनी ख्वाहिशों से परहेज है। रोजेदार अपने हाथ-कान-कदमों से भी रोजा करता है, अर्थात हाथों से किसी पर जुल्म ना करना, कानों से बुरी बात ना सुनना, आंखों से किसी पर बुरी नजर ना डालना यही रमजान का पैगाम है।

बूंदी.रमजान के पहले जुमे पर नमाज अदा करते मुस्लिम बंधु।

भास्कर न्यूज | बूंदी

शहर अौर देहात की मस्जिदों में शुक्रवार को अकीदतमंदों ने उत्साह के साथ रमजान माह के पहले जुमे की नमाज अदा की। शहर की छोटी-बड़ी 24 मस्जिदों में नमाज अदा की गई। मुस्लिम समाजजनों ने देश में खुशहाली, भाईचारे के साथ ही अच्छी बरसात के लिए दुआ की।

पहले रोजे पर सुबह 3 बजे उठकर नित्यकर्म से निबट कर रोजेदारों ने 4 बजे सहरी खत्म की। फज्र की नमाज अदा करने के बाद घरों पर कुरआन की तिलावत की गई तथा रोजेदार अपने काम-धंधे में जुट गए। दोपहर जोहर व असर की नमाज अदा की गई। इफ्तारी का सामान खरीदने रोजेदार बाजारों में निकल पड़े, फल, खजूर की खूब खरीदारी हुई। रमजान माह शुरू होते ही बाजारों में फल के दाम भी दोगुने हो गए। रोजे को लेकर बच्चे, बुजुर्ग में भारी गर्मी के बावजूद उत्साह रहा। मिस्त्री मार्केट और लाख-चूड़ी का काम करनेवाले भटि्टयों के आगे काम करते हुए भी रोजा रख रहे हैं।

मौलाना असलम ने बताया कि रहमत और बरकत के नजरिये से रमजान के महीने को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा हिस्सा मगफिरत का होता है। जिसमें अल्लाह अपने बंदों की मगफिरत करता है। तीसरे हिस्से में दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित करता है। रोजा गुनाहाें से दूर रखता है। देश या समाज के हालात कितने भी बदल जाएं, मजहब कभी नहीं बदलता। मजहबी बातों की सच्चाई लोगों को सही रास्ता दिखाती है। रोजा रखना इंसान को गुनाहों से दूर करता है। इससे रूह को नई ताकत मिलती है। शरीर और आत्मा शुद्ध होती है। व्यक्ति अल्लाह के करीब पहुंचता है। रोजा रखने से इंसान समर्पण भाव रखनेवाला हो जाता है। अल्लाह के प्रति डर उनके बताए रास्ते पर चलने की आदत, इबादत करने की चाह और गुनाहों से लड़ने की शक्ति आती है।

इस्लाम की बुनियादी तालीम का चौथा हिस्सा है रोजा: पूर्व शहर वक्फ कमेटी अध्यक्ष मौलाना असलम ने कहा कि रोजा अल्लाह की इबादत का एक तरीका है। इस्लाम की बुनियादी तालीम में चौथा हिस्सा रोजा है। पहला कलमा, दूसरा नमाज, तीसरा जकात, चौथा रोजा व पांचवां हज है। रोजा एक इबादत है, इस महीने में खुदा ने इंसानों को सीधा रास्ता दिखाने के लिए अपनी आखिरी किताब कुरआन-ए-पाक को नाजिल किया। जो दुनिया में रहकर, दुनिया तक इंसान की हिदायत के लिए रोशनी की मिनार है। रमजान में एक महीने तक रोजेदार की एक तरह से ट्रेनिंग हो जाती है, सुबह से शाम तक खाना-पीना और अपनी ख्वाहिशों से परहेज है। रोजेदार अपने हाथ-कान-कदमों से भी रोजा करता है, अर्थात हाथों से किसी पर जुल्म ना करना, कानों से बुरी बात ना सुनना, आंखों से किसी पर बुरी नजर ना डालना यही रमजान का पैगाम है।

भास्कर न्यूज | बूंदी

शहर अौर देहात की मस्जिदों में शुक्रवार को अकीदतमंदों ने उत्साह के साथ रमजान माह के पहले जुमे की नमाज अदा की। शहर की छोटी-बड़ी 24 मस्जिदों में नमाज अदा की गई। मुस्लिम समाजजनों ने देश में खुशहाली, भाईचारे के साथ ही अच्छी बरसात के लिए दुआ की।

पहले रोजे पर सुबह 3 बजे उठकर नित्यकर्म से निबट कर रोजेदारों ने 4 बजे सहरी खत्म की। फज्र की नमाज अदा करने के बाद घरों पर कुरआन की तिलावत की गई तथा रोजेदार अपने काम-धंधे में जुट गए। दोपहर जोहर व असर की नमाज अदा की गई। इफ्तारी का सामान खरीदने रोजेदार बाजारों में निकल पड़े, फल, खजूर की खूब खरीदारी हुई। रमजान माह शुरू होते ही बाजारों में फल के दाम भी दोगुने हो गए। रोजे को लेकर बच्चे, बुजुर्ग में भारी गर्मी के बावजूद उत्साह रहा। मिस्त्री मार्केट और लाख-चूड़ी का काम करनेवाले भटि्टयों के आगे काम करते हुए भी रोजा रख रहे हैं।

मौलाना असलम ने बताया कि रहमत और बरकत के नजरिये से रमजान के महीने को तीन हिस्सों में बांटा जाता है। पहले 10 दिनों में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों की बारिश करता है। दूसरा हिस्सा मगफिरत का होता है। जिसमें अल्लाह अपने बंदों की मगफिरत करता है। तीसरे हिस्से में दोजख की आग से निजात पाने की साधना को समर्पित करता है। रोजा गुनाहाें से दूर रखता है। देश या समाज के हालात कितने भी बदल जाएं, मजहब कभी नहीं बदलता। मजहबी बातों की सच्चाई लोगों को सही रास्ता दिखाती है। रोजा रखना इंसान को गुनाहों से दूर करता है। इससे रूह को नई ताकत मिलती है। शरीर और आत्मा शुद्ध होती है। व्यक्ति अल्लाह के करीब पहुंचता है। रोजा रखने से इंसान समर्पण भाव रखनेवाला हो जाता है। अल्लाह के प्रति डर उनके बताए रास्ते पर चलने की आदत, इबादत करने की चाह और गुनाहों से लड़ने की शक्ति आती है।

इस्लाम की बुनियादी तालीम का चौथा हिस्सा है रोजा: पूर्व शहर वक्फ कमेटी अध्यक्ष मौलाना असलम ने कहा कि रोजा अल्लाह की इबादत का एक तरीका है। इस्लाम की बुनियादी तालीम में चौथा हिस्सा रोजा है। पहला कलमा, दूसरा नमाज, तीसरा जकात, चौथा रोजा व पांचवां हज है। रोजा एक इबादत है, इस महीने में खुदा ने इंसानों को सीधा रास्ता दिखाने के लिए अपनी आखिरी किताब कुरआन-ए-पाक को नाजिल किया। जो दुनिया में रहकर, दुनिया तक इंसान की हिदायत के लिए रोशनी की मिनार है। रमजान में एक महीने तक रोजेदार की एक तरह से ट्रेनिंग हो जाती है, सुबह से शाम तक खाना-पीना और अपनी ख्वाहिशों से परहेज है। रोजेदार अपने हाथ-कान-कदमों से भी रोजा करता है, अर्थात हाथों से किसी पर जुल्म ना करना, कानों से बुरी बात ना सुनना, आंखों से किसी पर बुरी नजर ना डालना यही रमजान का पैगाम है।

प्रेम-भाईचारा-इंसानियत का संदेश देता है रमजान

मौलाना असलम ने बताया कि खुद को खुदा की राह में समर्पित कर देने का प्रतीक पाक महीना माहे रमजान ना सिर्फ रहमतों, बरकतों की बारिश करता है, बल्कि समूची मानव जाति को प्रेम, भाईचारा, इंसानियत का भी संदेश देता है। इस पाक महीने में अल्लाह अपने बंदों पर रहमतों का खजाना लुटाता है। भूखे-प्यासे रहकर खुदा की इबादत करनेवालों को माफ करता है। इस माह में जन्नत की राह खुलती है। रोजा अच्छी जिंदगी जीने का प्रशिक्षण भी है। जिसमें इबादत कर खुदा की राह पर चलने वाले इंसान का जमीर रोजेदार को एक नेक इंसान के व्यक्तित्व के लिए जरूरी हर बात की तरबियत देता है। पूरी दुनिया की कहानी भूख-प्यास और इंसानी ख्वाहिशों के इर्द-गिर्द घूमती है, रोजा इन तीनों चीजों पर नियंत्रण रखने की साधना है।

नैनवां. पवित्र रमजान माह की शुरुआत शुक्रवार से हुई। इस अवसर पर रमजान माह के पहले जुमे की सामूहिक नमाज जामा मस्जिद में शहर काजी अब्दुल नईम ने अदा करवाई। इस अवसर पर अंजुमन इस्लाम कमेटी सदर आशिक हुसैन ने रमजान माह पर तकरीर पेश करते हुए रोजे के महत्व पर प्रकाश डाला।

खबरें और भी हैं...