बारिश में जितना पानी जमीन में रिचार्ज होता है, उससे कहीं ज्यादा हम निकाल रहे हैं। यही वजह है कि जिले का 80 फीसदी से ज्यादा इलाका डार्क जोन से भी नीचे की कैटेगिरी में आ चुका है। कुएं-बावड़ियां सूख चुके हैं। बूंद-बूंद पानी के लिए बूंदी में लोग जूझ रहे हैं, झगड़ रहे हैं, धरने-प्रदर्शन कर रहे हैं। केंद्रीय भूजल बोर्ड के मुताबिक 20 साल से पहले जिले की जमीन में पानी खत्म हो जाएगा।
प्रशासन टैंकर पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, पर ये जतन ऊंट के मुंह में जीरा है। भूजल विभाग के आंकड़े देखें तो हर साल बूंदी में भूजल स्तर गिर रहा है। हर साल मानसून बाद जलस्तर में 34 सेमी की गिरावट आ रही है। हिंडौली, नैनवां, केपाटन उपखंड में खेती के साथ ही पीने के पानी का संकट खड़ा हो रहा है। जिले का 20 फीसदी हिस्सा ही नहरी है। 80 फीसदी क्षेत्र कुएं, बावड़ी, नलकूप- प्राकृतिक जलस्त्रोतों पर निर्भर है। बरसात घट रही है, खेती का रकबा तेजी से बढ़ रहा है। नलकूप लगातार खोदे जा रहे हैं, पर पानी का दोहन बढ़ता जा रहा है। हिंडौली-नैनवां बेल्ट में तो पानी का घोर संकट है, नहरी इलाके केपाटन, तालेड़ा में भी जलस्तर लगातार घट रहा है।
फिर भी हम नहीं सुधर रहे
बूंदी. पूरा शहर पानी के संकट से घिरा है। इसके बावजूद शुक्रवार रात को नैनवां रोड पर राजपूत कॉलोनी में होटल चांदना के पास पानी व्यर्थ बहता रहा। इसी कॉलोनी में पिछले 25 दिनों से घरों में पानी नहीं आने की शिकायतें बनी हुई हैं।
भास्कर के जल मित्र लोगों को कर रहे जागरूक
सामूहिक प्रयासों से भूजल संरक्षित एवं रिचार्ज किया जा सकता है। जलप्रबंधन व संरक्षण से ही जलसंकट से निबटा जा सकता है। भास्कर जल मित्र लोगों में जनजागृति कर घरेलू् स्तर, कृषिस्तर, औद्योगिक स्तर पर जल बचाने के लिए प्रयासरत हैं। घरेलू स्तर पर निष्कासित जल का बगीचों में पुनः उपयोग करना एवं घरेलू नलों से व्यर्थ पानी ना बहाना। सार्वजनिक नल से जल को न बहने दें। कृषि क्षेत्र में फव्वारा व बूंद-बूंद सिंचाई पद्धति अपनाकर, कम पानी उपयोग वाली फसलें उगाकर, औद्योगिक स्तर पर उपयोग में लाए पानी की 80 प्रतिशत मात्रा को पुनः उपयोग के लिए रिसाइक्लिंग किया जा सकता है।
पानी को लेकर हालात गंभीर: भूजल वैज्ञानिक
भूजल विभाग के प्रभारी व भूजल वैज्ञानिक शैलेंद्रकुमार का कहना है कि लोगों की भ्रांति है कि भूमि के नीचे अथाह पानी है। भूजल का एकमात्र स्रोत वर्षा जल है। जितनी वर्षा होती है, उसका 12 से 15 फीसदी ही धरती में जा पाता है। वही हमें भूजल के रूप में मिलता है। चट्टानी क्षेत्रों में तो भूमि के नीचे जाने वाले पानी की मात्रा 12 फीसदी से भी कम है। जिले का कुल क्षेत्रफल 5765.46 वर्ग किमी है और सामान्य वार्षिक वर्षा 675.27 मिमी है। जिले के पठारी क्षेत्र में वार्षिक वर्षा का लगभग 12 फीसदी एवं चट्टानी क्षेत्रों में 7 फीसदी पानी ही जमीन में जा रहा है, जिससे लगभग 309 मिलियन घनमीटर भूजल जमा होता है।
इधर, संकट की तस्वीर
नैनवां. हैंडपंप पर पानी के लिए लगी भीड़। कई मोहल्लों में संकट तेज।
नैनवां में 96 घंटे बाद भी नसीब नहीं हुआ पानी, वजह बताई बिजली गुल
नैनवां| शहर में तीसरे दिन शुक्रवार को भी जलापूर्ति सामान्य नहीं हुई। उपभोक्ताओं पेयजल के लिए जतन करने पड़ रहे हैं। जलदाय विभाग द्वारा शहर में पाइबालापुरा पेयजल योजना से मिल रहे पानी के अतिरिक्त 101 टैंकर पानी की सहायता से 3 दिन के अंतराल में सप्लाई की जा रही है, लेकिन यह व्यवस्था भी बरकरार नहीं रह पा रही है। कहीं जोनों में 4 दिन में पानी सप्लाई हो पा रहा है। शहर के सीधे बूस्टिंग सप्लाई से जुडे़ राजघाट, मुख्य बाजार, कोली मोहल्ले, गाडीखाना में शुक्रवार को 96 घंटे जलापूर्ति की गई। जलदाय विभाग की जेईएन अर्चना सुमन ने बताया कि बुधवार को 5 घंटे, गुरुवार को 2 घंटे बिजली बंद रहने के कारण 72 घंटों में होने वाली जलापूर्ति व्यवस्था गड़बड़ा गई थी। इसके कारण 72 घंटे में जिन जोन में जलापूर्ति नहीं हो पाई, उनमें 96 घंटों में की गई। एक बार जलापूर्ति का रोटेशन गड़बडा़ जाने पर वापस व्यवस्था सामान्य होने में दो-तीन दिन लग जाते हैं।