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बूंदी में लॉ कॉलेज खोलकर चलाने की जरूरत भूल गई सरकार, नेता भी चुप

3 वर्ष पहले
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प्रदेश के ज्यादातर सरकारी लॉ कॉलेज सरकारी अनदेखी के शिकार हैं। इनमें न स्टाफ, न प्राचार्य, न बिल्डिंग, न फोन और न टाॅयलेट। कुछ लॉ कॉलेज में सालों से नए एडमिशन तक नहीं हुए।

प्रदेश के 15 में से 13 लॉ कॉलेजों में वर्ष 17-18 में नए एडमिशन ही नहीं हुए। प्रदेश में लॉ के महज 35 व्याख्याता हैं, जिनमें से 5 व्याख्याता अल्का भाटिया, शोभाराम शर्मा, सुनील वर्मा, विजय बेनीवाल, अाशीषकुमार आयुक्तालय जयपुर में डेपुटेशन पर लगे हैं। व्याख्याता डीएस थालोर सीकर की शेखावाटी यूनिवर्सिटी में डेपुटेशन पर हैं। दूसरी ओर 15 लॉ कॉलेज व्याख्याताओं की कमी से जूझ रहे हैं। प्रदेश के 15 लॉ कॉलेज महज 29 व्याख्याताओं के भरोसे चल रहे हैं। इनमें से कुछ रिटायर होने वाले हैं। वर्ष 2014 में आरपीएससी ने 86 पोस्ट भरने के लिए वेकेंसी निकाली थी, जिसका अभी तक रिजल्ट नहीं आया। हाड़ौती की बात करें तो कोटा, बूंदी और झालावाड़ में लॉ कॉलेज हैं। इनमें बूंदी-झालावाड़ महज एक-एक व्याख्याता के भरोसे चल रहे हैं। ये व्याख्याता भी डेपुटेशन पर हैं।

खामी-उपेक्षित भवन में शुरू कराया लॉ कॉलेज

बूंदी के लॉ कॉलेज की हालत दयनीय है। स्टाफ, बिल्डिंग और कोटा यूनिवर्सिटी से वक्त रहते एफिलेशन नहीं होने के कारण बीसीआई (बार काउंसिल ऑफ इंडिया) ने मान्यता नहीं दी। वर्ष 2006 में बूंदी के पीजी कॉलेज कैंपस के ही एक उपेक्षित भवन में लॉ कॉलेज शुरू हुआ। वर्ष 2010-11 में छात्रों के एडमिशन हुए, फिर दाखिले बंद हो गए। वर्ष 2016-17 में एडमिशन हुए, वे भी जनवरी में, जबकि होने सितंबर में थे। वर्ष 16-17 के लिए बार काउंसिल ने इंस्पेक्शन के बाद मान्यता नहीं दी। बीसीआई की टीम ने 24 अप्रैल को ही इस कॉलेज का निरीक्षण किया था। ऐसे में अब वर्ष 16-17 में प्रवेश लेने वाले छात्रों की सैकंड ईयर की चौथे सेमेस्टर की ही कक्षा चल रही है।

बूंदी. लॉ कॉलेज के कमरों की हालत, जहां चोरी होने का भी अंदेशा रहता है।

सीकर से बूंदी लॉ कॉलेज में मुझे डेपुटेशन पर लगाया गया है। स्टाफ और संसाधनों की भारी कमी है। विपरीत हालात में कॉलेज चल रहा है। नए वर्ष 16-17 के बाद एडमिशन बंद हैं। इससे ज्यादा कमिश्नर कॉलेज एजुकेशन या उच्च शिक्षामंत्री ही बता सकेंगे। -सुरेशकुमार नायक, व्याख्याता, लॉ कॉलेज बूंदी

हालत-एक व्याख्याता, वही प्रिंसिपल और सब-कुछ

बूंदी लॉ कॉलेज में व्याख्याताओं के चार, यूडीसी की एक, ओए की एक पोस्ट है। चतुर्थश्रेणीकर्मी की तो पोस्ट ही नहीं है। सीकर से सुरेशकुमार नायक को डेपुटेशन पर लगाया हुआ है। जिनका हर महीने डेपुटेशन पीरियड बढ़ा दिया जाता है। वे ही सब-कुछ हैं। पीजी कॉलेज कैंपस के एक कोने में उधार के 3 कमरों में यह कॉलेज चलता है, एक रूम में ही प्रिंसिपल व बाबू बैठे रहते हैं। प्रिंसिपल कक्ष की हालत बदतर है। गेट तक टूटे पड़े हैं। शौचालय तक नहीं, छात्र और इक्का-दुक्का स्टाफ दीवारों का सहारा लेते हैं। गर्मी में कूलर नहीं, बस गर्म हवा फेंकता पंखा है। ना टेलीफोन है, ना पानी का बंदोबस्त। एक कंप्यूटर है, जो खराब पड़ा है। मेल भेजने या लेने के लिए पीजी कॉलेज जाना पड़ता है। 3 कमरों में से एक ही कमरे में कक्षाएं चलती हैं, एक की पटि्टयां टूटी हुई हैं।

रिकॉल-अनफिट बिल्डिंग प्रस्तावित की थी : साल-2008 में नेशनल हाईवे पर टनल के पास जंगली बबूलों के बीच गर्ल्स कॉलेज के लिए बनी बिल्डिंग इस लॉ कॉलेज को अलॉट करने के प्रयास हुए। गर्ल्स कॉलेज के लिए यह बिल्डिंग अनफिट कर दी गई थी, हाईवे बना तो इसका एक तिहाई हिस्सा उसमें आ गया। खंडहर हो चुकी यह बिल्डिंग लॉ कॉलेज को देने के लिए कॉलेज आयुक्तालय ने तकमीना मांगा, जो पीडब्ल्यूडी ने बनाकर नहीं दिया।

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