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कानूनी दांवपेच में उलझ सकता है पार्क में पार्किंग का प्रोजेक्ट

3 वर्ष पहले
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शहर में पार्किंग की समस्या से निबटने के लिए नगरपरिषद ने आजाद पार्क में साढ़े 8 करोड़ का अंडरग्राउंड पार्किंग के लिए प्रोजेक्ट बना लिया, पर कहीं यह हाईकोर्ट के उस फैसले के खिलाफ तो नहीं, जो उसने 31 अगस्त, 1987 को सिटीजन बूंदी वर्सेस म्युनिसिपल बोर्ड केस में दिया था।

तत्कालीन हाईकोर्ट जज गुमानमल लोढ़ा ने लोअर कोर्ट की स्थाई निषेधाज्ञा को कायम रखते हुए म्युनिसिपल बोर्ड को पाबंद किया था कि भविष्य में भी इस पार्क में किसी तरह का बदलाव या इसके मूलस्वरूप से छेड़छाड़ नहीं की जाए। शहर के बीचोंबीच इस पार्क में नागरिक टहलने, घूमने और शांति की तलाश में आते हैं। यहां सभाएं, बैठकें, आयोजन होते हैं। कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा था कि वर्ष1973 के साइट प्लान में मौजूद दुकानों के अलावा पार्क से कोई छेड़छाड़ नहीं की जाए। मामले के अनुसार आजाद पार्क में पानी की टंकी बनाने पर विवाद खड़ा हो गया था। शहर के लोग पार्क में टंकी निर्माण के खिलाफ थे।

वरिष्ठजनों रामदत्त दौराश्री, छीतरलाल जैसे कई नामीगिरामी लोगों ने कोर्ट का सहारा लिया। मामला लोअर कोर्ट से हाईकोर्ट जा पहुंचा। तब बूंदी नागरिकों की ओर से सीनियर मोस्ट एडवोकेट रघुनाथप्रसाद शर्मा ने पैरवी की थी। हाईकोर्ट में म्युनिसिपल बोर्ड की ओर से कहा गया था कि पार्क के रखरखाव के लिए पानी की टंकी बनाई जा रही है। हाईकोर्ट ने तब इस शर्त पर ही टंकी बनाने की इजाजत दी थी कि पार्क का मूलस्वरूप नहीं बिगड़ना चाहिए और इस टंकी के पानी का इस्तेमाल सिर्फ पार्क को डवलप करने में ही किया जाएगा।

कोई कोर्ट पूर्व में दिए फैसले में नहीं कर सकता बदलाव

नगरपरिषद कह रही है कि वह हाईकोर्ट से इसकी इजाजत ले चुकी है। कानून के जानकारों का कहना है कि हाईकोर्ट के 1987 के फैसले को कैसे आेवर रूल कर परमिशन ली गई। कोई भी न्यायालय अपने द्वारा पूर्व में दिए गए अपने फैसले में केवल गणितीय त्रुटि के अलावा कोई बदलाव नहीं कर सकता। जब तक कि उस फैसले को बड़ी बैंच या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती नहीं दी जाती। अगर ऐसी कोई परमिशन दी है तो यह भी बताना पड़ेगा कि यह किस तरह लोकहित में है? पार्क में पार्किंग से बड़े पेड़ काटे जाएंगे, वाहनों से प्रदूषण बढ़ेगा, पार्क का मूल मकसद ही खत्म हो जाएगा।

पार्क में पार्किंग का यह है प्रोजेक्ट: शहर में पार्किंग बड़ी समस्या है, भीड़भाड़ वाले इलाके कोटा रोड, सब्जीमंडी रोड, इंदिरा मार्केट, नगरपरिषद रोड सहित बाजारों में पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। प्रमुख बाजारों में दो से तीन हजार बाइक, कार-जीपें खड़ी रहती हैं। इंदिरा मार्केट में तो दुकानों के दरवाजे तक गाड़ियां खड़ी रहती है, ग्राहक अंदर तक आसानी से नहीं जा सकते। नगरपरिषद आजाद पार्क में पार्किंग बनाना चाहती है। इसके अलावा 8 करोड़ 29 लाख का प्रोजेक्ट बनाया गया है। अंडरग्राउंड पार्किंग और ऊपर लॉन विकसित होगा। पार्क डवलप के लिए डेढ़ करोड़ का बजट रखा है।

ये कहना है परिषद के विधि सलाहकार का

हाईकोर्ट के जज महेश शर्मा ने डेढ़ साल पहले रनिंग केस में आजाद पार्क में ऊपर पार्क डवलप करने की शर्त पर अंडरग्राउंड पार्किंग की परमिशन दे दी थी। इसके लिए डेढ़ करोड़ का बजट रखा गया है। प्रोजेक्ट शुरू करने में कोई अड़चन नहीं है।

विधि सलाहकार की राय से असहमत विधिवेत्ता

विधिवेत्ता प्रमोद बाकलीवाल सहित अन्य अधिवक्ताओं के मुताबिक नगरपरिषद ने परमिशन के लिए कब हाईकोर्ट में दरख्वास्त लगाई? कब परमिशन मिली, किसने सुना, उस केस में शामिल दूसरी पार्ट बूंदी के नागरिकों को नोटिस कब जारी हुए? उनको भी कोर्ट ने सुना क्या? वर्ष 1987 के हाईकोर्ट के फैसले को तोड़ने के लिए नगरपरिषद के पास क्या तथ्य हैं? नगरपरिषद बोर्ड ने भी अगर इस प्रोजेक्ट का प्रस्ताव लिया है तो वह भी कोर्ट फैसले के खिलाफ है। (शेष | पेज 16)

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