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ग्रामीण डाकसेवकों को 7 हजार वेतन जिम्मेदारी सौ गुना, इसलिए हड़ताल

3 वर्ष पहले
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अपनी लंबित मांगों को लेकर 22 मई से जिले के ग्रामीण डाकसेवक फिर बेमियादी हड़ताल पर जाएंगे। मंगलवार को मुख्य डाकघर बूंदी के सामने बेमियादी धरना भी शुरू करेंगे। जिले में 234 ग्रामीण डाकसेवक हैं। ग्रामीण डाक सेवक कमलेश चंद्रा कमेटी की रिपोर्ट लागू करने की मांग कर रहे हैं।

इस मुद्दे पर चर्चा के लिए ग्रामीण डाकसेवकों की बैठक मालनमासी हनुमान धर्मशाला में हुई। बैठक में जिले के शाखा डाकघरों के ग्रामीण डाकसेवक जुटे। ग्रामीण डाकसेवक संघ के जिलाध्यक्ष नारायण शृंगी, सचिव नवलकिशोर माहेश्वरी ने बताया कि बैठक में जिले में आंदोलन चलाने की रणनीति बनाई गई। बैठक में भुमेश्वर शर्मा, नंदलाल सैनी, घनश्याम वर्मा, हरिसिंह हाड़ा, जगदीश चौधरी, हरिशंकर शर्मा, रमेशचंद्र शर्मा सहित अन्य ग्रामीण डाकसेवक मौजूद रहे।

हर डाकसेवक के पास कई गांवों की जिम्मेदारी

महज 7 हजार रुपए महीना मानदेय पर काम कर रहे ग्रामीण डाककर्मियों का सरकार भी शोषण कर रही है। इस मानदेय में उन्हें वे सब काम करने पड़ते हैं जो स्थाई डाक कर्मचारी करते हैं। एक-एक ग्रामीण डाकसेवक के पास दसियों गांवों की जिम्मेदारी होती है। 10 से 20 किलोमीटर के एरिया में उन्हें डाक ही नहीं बांटनी होती, और भी बहुत से काम करने पड़ते हैं। सुकन्या योजना के खाते, आरडी के खाते, चालू खाते भी खोलने पड़ते हैं। पीएलआई करनी पड़ती है। इन्हें बाकायदा टारगेट दिए जाते हैं, जो पूरे करने पड़ते हैं। बदले में कोई टीए भी नहीं मिलता।

जमा 5 लाख भी कर सकते हैं, पर देने का पावर 5 हजार का

ग्रामीण डाकसेवकों को चालू खाते भी खोलने पड़ते हैं, वे इन खातों में जमा तो कितने भी रुपए ले सकते हैं, पर ग्राहक जब लेने आए तो महज 5 हजार रुपए ही देने का पावर है। अगर कोई ग्रामीण ग्राहक को 6 हजार रुपए की भी जरूरत पड़ गई या तीन ग्राहक भी दो-दो हजार रुपए निकलवाने आ गए तो भी ये ग्रामीण डाकसेवक उन्हें पैसा नहीं दे सकते। 5 हजार रुपए से ज्यादा देने हैं तो पहले उच्चाधिकारियों से पैसा पास करवाना पड़ता है। इसके लिए बूंदी जाना पड़ता है। इस प्रक्रिया में दो-तीन दिन लग जाते हैं। लोगों को तुरंत पैसा चाहिए, पर जब पूरा पैसा नहीं मिलता तो उनका गुस्सा ग्रामीण डाकसेवकों पर ही उतरता है।

और यह भी करना पड़ता है...

उच्चाधिकारी आते हैं और अपना कमिशन बनाने के चक्कर में ग्रामीण डाकसेवकों का जबरन बीमा कर जाते हैं। ग्रामीण डाकसेवक मजबूर होते हैं, उन्हें अपना बीमा कराना पड़ता है, बीमा किश्त मानदेय से कट जाती है। ऐसे में उनके पल्ले कुछ नहीं पड़ता।

पेट तो रोटी मांगता है-अध्यक्ष

27 साल हो गए काम करते हुए, तब से संघर्ष कर रहे हैं, सरकार हमारी पीड़ा सुनती ही नहीं। इतने बरस सेवा के बाद भी आज तक परमानेंट नहीं किया। तीन घंटे की ड्यूटी और सात हजार रुपए तनख्वाह है। क्या-क्या काम करें? 10 से 20 किमी एरिया में डाक बांटे कि डाकघर के टारगेट पूरे करें। पेट तो रोटी मांगता है। घर-परिवार की और भी जरूरते हैं। तरह-तरह के खाते खोलो, लोगों के पैसे जमा करो। कोई खातेदार छह हजार रुपए लेने आ गया तो देने का पावर नहीं। पहले बूंदी जाओ, वहां से अधिकारियों से मंजूर कराकर लाओ। डाकसेवक भारी पीड़ा में हैं। -नारायण शृंगी, अध्यक्ष ग्रामीण डाकसेवक संघ, बूंदी

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