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पैथोलॉजी लैब को रिनोवेशन कर बना रहे नया ब्लड बैंक भवन, तोड़फोड़ करने से उड़ रही डस्ट, 300 यूनिट ब्लड तक को संक्रमण का है खतरा

3 वर्ष पहले
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जिला अस्पताल परिसर में पुरानी पैथोलॉजी लेब को तोड़कर इन दिनों नए ब्लड बैंक भवन का निर्माण किया जा रहा है। इसी परिसर में ब्लड बैंक चल रही है।

तोड़फोड़ और निर्माण से उड़ रही डस्ट से मरीज व परिजन परेशान हैं, वहीं पास में संचालित 300 यूनिट ब्लड पर भी संक्रमण का खतरा रहा है। गौरतलब है कि इस भवन के निर्माण के लिए स्वीकृत 50 लाख रुपए अस्पताल प्रशासन की उदासीनता से लैप्स हो गए। ब्लड बैंक पैथोलॉजी लैब में चल रही है। इसी स्थान को मॉडिफाइड कर ब्लड बैंक का रूप दिया जा रहा है। जिला अस्पताल की ब्लड बैंक मानक स्तर का नहीं होने के कारण औषधि नियंत्रण विभाग की ओर से पिछले साल लाइसेंस का नवीनीकरण नहीं किया है। इसके बावजूद पिछले साल आनन-फानन में अस्पताल परिसर में जनऔषधि भवन के पास नया भवन बनाने के लिए जगह देकर इस भवन निर्माण के लिए 50 लाख मंजूर कर दिए, लेकिन बजट कम होने से भवन निर्माण टेंडर नहीं निकाला और काम रुक गया। इसके चलते यह बजट लैप्स हो गया। अब अस्पताल प्रशासन 30 लाख रुपए के रेनोवेशन बजट से पैथोलॉजी लैब को ही ब्लड बैंक का रूप देने के प्रयास में जुटा है। ब्लड बैंक अस्पताल के अंदर होने और एक संकरे गलियारे में होने से आमजन को दिखाई नहीं देगी। इसके पास में सर्जिकल वार्ड, सोनोग्राफी सेंटर, मुख्यमंत्री निशुल्क जांच के कक्ष हैं, जहां हर समय भीड़ रहती हैं। ऐसे में ब्लड के संक्रमित होने का खतरा बना रहेगा। परिसर में जगह कम होने से शिविर लगाने में भी परेशानी होगी। ब्लड बैक के अस्पताल में वार्ड के पास बनाने से गंभीर रोग के पीड़ित मरीजों के लिए भी परेशानी रहेगी। यह ब्लड बैंक 10 साल तक ही चल पाएगी, उसके बाद फिर से नया बनाना पड़ेगा। ऐसे में इसी बजट में नए भवन का निर्माण किया जाता तो वह मानक स्तर का बनता और आमजन की पहुंच में होता था। लेकिन, अस्पताल प्रशासन ने इस बात का ध्यान नहीं दिया।

रिनोवेशन

जिला अस्पताल का मामला, ब्लड बैंक भवन निर्माण के लिए स्वीकृत 50 लाख रुपए हो चुके लैप्स

अस्पताल प्रशासन और सरकारी लापरवाही

जिला अस्पताल में 1995 में पेथॉलोजी लैब बनाई। बाद में इसी में ब्लड बैंक शुरू कर दी। औषधि नियंत्रण विभाग ने इसे मानक स्तर का नहीं माना। पैथोलॉजी लैब और ब्लड बैंक के मानक अलग-अलग होते हैं। दोनों की लैब में अंतर होता है। उसके बावजूद पैथोलॉजी लैब को ब्लड बैंक बनाई जा रही है।

पहली लापरवाही: अस्पताल में ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट भवन निर्माण व मशीनें खरीदने के लिए पिछले साल बजट में 1 करोड़ 30 लाख रुपए का बजट स्वीकृत किया था। इसमें से 50 लाख रुपए भवन निर्माण के लिए, शेष राशि मशीनें खरीदने के लिए स्वीकृत की गई। दूसरी लापरवाही: सरकारी बजट से चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग जयपुर ने लाखों रुपए की मशीनें खरीद कर बूंदी अस्पताल भेज दी, लेकिन भवन नहीं बनने से मशीनें अस्पताल परिसर में ही धूल फांक रही हैं। डेंगू रोगियों को प्लेटलेट्स के लिए कोटा जाना पड़ रहा है।

ब्लड कंपोनेंट सेपरेशन यूनिट के भवन के लिए स्वीकृत 50 लाख रुपए नहीं मिलने से पैथोलॉजी लैब को मॉडीफाइड कर ब्लड बैंक का रूप दिया जा रहा है। ब्लड संक्रमित नहीं हो, इसका पूरा ध्यान रखा जा रहा है। तोड़फोड़ से उड़ने वाली धूल को रोकने के लिए प्लास्टिक- तिरपाल से कवर करने के बाद ही तोड़फोड़ करने के निर्देश ठेकेदार को दे दिए हैं। जिससे मरीजों को परेशानी नहीं हो। -डॉ. ओपी वर्मा, उपनियंत्रक, जिला अस्पताल

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