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जेलएन कॉलेज में ओड़िया भाषा के प्रोफेसर संजय जन्म से नेत्रहीन ब्रेल लिपि से तैयार करते हैं लेसन प्लान, फिर लेते हैं क्लास

3 वर्ष पहले
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ओडिशा के एक गरीब किसान के घर में पैदा हुए संजय बारिक बड़ा होकर प्रोफेसर बारिक हो जाएंगे, ये उनके माता-पिता ने भी नहीं सोचा था। संजय जन्म से अंधे हैं। उनके पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे संजय का इलाज करा सके। जन्मांध होने के कारण महाभारत के संजय की तरह माता-पिता ने उनका नाम भी संजय रख दिया। संजय ने अपनी मेहनत और लगन से अब झारखंड में प्रोफेसर संजय बारिक हैं। उम्र 40 वर्ष। वे आठ सालों से झारखंड में ओड़िया भाषा के प्रोफेसर हैं। फिलहाल वे जवाहर लाल नेहरू कॉलेज में कार्यरत हैं। हैरानी ये कि संजय के हजारों स्टूडेंट ऐसे हैं जो संजय से ही पढ़ना पसंद करते हैं। संजय के पढ़ाने का अंदाज भी जुदा है। वे खुद तो क्लास में लेक्चर देते हैं, लेकिन ब्लैकबोर्ड पर लिखने वाला कोई दूसरा होता है। संजय अपने साथ एक सहयोगी कर्ण कुंभकार को रखते हैं। बहरहाल संजय बिना आंखों के जो मुकाम हासिल किए हैं, वे काबिले तारिफ है। कॉलेज में उनकी काबिलियत के कारण हर कोई उन्हें मदद करते दिखता है। उनसे पढ़कर बड़े पदों पर अधिकारी बने छात्र भी जब मिलते तो उन्हें सड़क पार कराने व बातचीत कर गर्व महसूस करते हैं। संजय मेहनत व लगन का एक जीता जागता मिसाल हैं।

प्रो. संजय बारिक

बचपन में खेल नहीं पाते थे, बड़ा होकर गरीबी का अहसास, संघर्ष व लगन से पाया मुकाम

प्रो. संजय बारिक बताते हैं कि बचपन से पता नहीं था कि और भी दुनिया है। मुझे भी लगता था कि मेरे जैसे ही और लोग होंगे। जब बड़ा होने लगा तब लोगों की आवाजों से माना कि वे दुनिया को देख रहे हैं। अपने पिता मंगराज बारिक के बारे में संजय बताते हैं कि पेशे से वे किसान ठहरे। उनके पास इतना पैसा कहां कि मेरा इलाज कराते। मेरा गांव कटक के बोड़ाबंदो में है। गांव के पास ही दृष्टिहीन विद्यालय होयाभुंई में कक्षा दसवीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद बीजेबी कॉलेज भुवनेश्वर से ओड़िया भाषा में स्नातक की डिग्री हासिल की। सारी पढ़ाई ब्रेल लिपि से की। इसके बाद उत्कल विश्वविद्यालय से एमए किया। वर्ष 2008 में विनोवा भावे विवि के धनबाद कतरास कॉलेज में प्रोफेसर के पद पर बहाल हुए। तीन वर्ष बाद 6 फरवरी 2010 को जेएलएन कॉलेज आए हैं।

प|ी एनटीपीसी में करती है नौकरी

प्रो. संजय बारिक की प|ी भी नौकरी करती है। एनटीपीसी तालचेर में व नौकरी कर रही हैं। दोनों से एक पांच साल की बेटी भी है। दोनों सुखमय जीवन जी रहे हैं।

संजय के पढ़ाने का अंदाज भी जुदा है, इसलिए विद्यार्थी उन्हीं से पढ़ना चाहते हैं, वे खुद क्लास में लेक्चर देते हैं, लेकिन ब्लैकबोर्ड पर लिखने का काम उनके सहयोगी कर्ण कुंभकार करते हैं

मैंने कमजोरी को हावी होने नहीं दिया: संजय बारिक

प्रोफेसर संजय बारिक कहते हैं-मैंने अपनी कमजोरी को हावी होने नहीं दिया। लगातार सकारात्मक पहल की। ब्रेल लिपी से पढ़ाई करते हुए इसी कोशिश में रहा कि खुद से मेरी प्रतियोगिता है। अपने को साबित करना है। आज लोग तारीफ करते हैं तो गर्व होता है। प्रोफेसर बारिक ब्रेल लीपी के मदद से घर रोजाना दो से तीन घंटे पढ़ाई करते हैं। पढ़ाई करने के बाद लेसन प्लान करते हैं। उसके बाद कॉलेज में पढ़ाते हैं।

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