मैं नहीं जानता कि आप ऐसे कितने पालकों को जानते हैं, जिन्होंने बच्चों के जुनून और वह भी खेल के लिए, अपने गहने गिरवी रख दिए। मैं यह खासतौर पर इसलिए कह रहा हूं, क्योंकि खेलों को स्वतंत्र भारत के इतिहास के ज्यादातर वर्षों में पेशा नहीं माना गया।
कम से कम मैं कुछ अभिभावकों को जानता हूं लेकिन, उन सभी ने भारत के सबसे लोकप्रिय खेल क्रिकेट को समर्थन दिया, क्योंकि कहीं न कहीं उन्हें अहसास था कि उनके गिरवी रखे गहने वापस आ जाएंगे। इसमें गलत कुछ भी नहीं है, क्योंकि इससे न सिर्फ गिरवी रखे आभूषणों से ज्यादा संपत्ति आई बल्कि बहुत प्रसिद्धि मिली और उनके बच्चे का जुनून भी पूरा हुआ। मैं निश्चित ही उनका समर्थन करूंगा, क्योंकि वे उन पालकों से अलग तो हैं, जो बच्चों के अंकों के माध्यम से अपने अधूरे शैक्षणिक सपनों का पीछा कर रहे होते हैं।
लेकिन, कोलकाता के पास पूर्वी बर्दवान की 14 वर्षीय ब्रिस्टी मुखर्जी के पालक एकदम अलग हैं। इस लड़की का दिल न जाने कैसे शतरंज पर आ गया और वह भी मात्र 6 साल की उम्र में। इसके अच्छे प्रशिक्षण की व्यवस्था उसके घर से 85 किलोमीटर दूर थी, जहां की एकतरफ की यात्रा में ही रोज तीन घंटे लग जाते। उसने जुलाई 2010 में वहां प्रवेश लिया और उसी वर्ष अक्टूबर में ब्रिस्टी ने अंडर-6 वर्ग में पहला टूर्नामेंट जीत लिया। 2011 में उसने अंडर-7 वर्ग में कांस्य पदक जीता। उसके बाद उसने मुड़कर नहीं देखा। जब भी प्रशिक्षण खत्म होने के बाद हावड़ा से 8:45 की ट्रेन छूट जाती है तो उसे अगली ट्रेन के लिए 90 मिनट इंतजार करना पड़ता है और वह आधी रात के बाद घर पहुंचती है। घर से ट्रेनिंग सेंटर तक जाने में स्थानीय ट्रेनों और खचाखच भरी बसों में उसके रोज छह घंटे खर्च होते। चूंकि पैसे की कमी के कारण वह किसी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में शामिल नहीं हो पाई, इसलिए उसकी मां अपरूपा ने 70 हजार रुपए से कुछ ज्यादा रकम की व्यवस्था करने के लिए अपने गहने गिरवी रख दिए। जबकि ब्रिस्टी को जो भी राशि टूर्नामेंट जीतने पर मिली थी उसे यात्रा-खर्च के लिए अलग रख दिया गया था लेकिन, वह पर्याप्त नहीं थी। उसके पिता किराने की दुकान चलाते थे पर दो साल पहले उन्होंने उसे बंद कर दिया, क्योंकि टूर्नामेंट व ट्रेनिंग के लिए बेटी के साथ जाने के कारण उनके पास बिज़नेस के लिए ज्यादा वक्त नहीं बचता था। परिवार का खर्च चलाने के लिए उसके पिता देबाशीष मुखर्जी ने अपने मकान का एक हिस्सा किराये पर दे दिया।
लेकिन, अब 14 साल की हो चुकी ब्रिस्टी ने अपने अभिभावकों को निराश नहीं किया। थाईलैंड के चिआंग माइ में 1 से 10 अप्रैल 2018 के बीच हुई एशियन यूथ चेस चैम्पियनशिप में लड़कियों के अंडर-14 वर्ग में ब्रिस्टी को रजत पदक से संतोष करना पड़ा। उसने लगातार चार चक्र में अपने से ऊंची रैंक वाली खिलाड़ियों को मात दी लेकिन, चीन की वान किआन के खिलाफ उसका अंतिम मैच ड्रा हो गया और वह आधे पॉइंट से स्वर्ण पदक गंवा बैठी। उसकी जीत के ठीक एक महीने बाद इस सोमवार को स्थानीय एनजीओ ने उसे आर्थिक मदद देने का वादा किया है। इसका मतलब है अब ब्रिस्टी को टूर्नामेंट की प्रवेश फीस, परिवहन और ठहरने के अलावा श्रेष्ठतम ट्रेनर की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। अधिकाधिक ओपन टूर्नामेंट खेलना रैटिंग सुधारने की कुंजी है और इस एनजीओ ने 2018 के लिए रूपरेखा तैयार कर ली है। वह कुछ कॉर्पोरेट समूहों से भी स्पॉन्सरशिप के लिए बातचीत कर रहा है। उसका पहला प्रायोजित टूर्नामंट इस माह के उत्तरार्ध में भुवनेश्वर में होगा।
फंडा यह है कि  बच्चे को उसके चुने हुए क्षेत्र में सफल देखना चाहते हैं तो क्षेत्र की लोकप्रियता नहीं, उसके लिए बच्चे का जुनून देखें।
एन. रघुरामन
मैनेजमेंट गुरु
raghu@dbcorp.in