क्लासिकल म्युजिक ही असली विरासत
हैरिटेज म्युजिक विरासत को बयां करता है। जबकि पंजाब में क्लासिकल आर्ट्स की जड़ें शुरुआत से ही मजबूत हैं। यह वो कला है जिनके साथ जुड़े रहना हमारा फर्ज भी है और जरूरत भी। यह बता रहे हैं क्लासिकल गायक प्रो. अलंकार सिंह। वह चंडीगढ़ संगीत नाटक एकेडमी की ओर से कराए जा रहे म्युजिक और डांस फेस्ट झंकार के तहत सेक्टर 18 के टैगोर थिएटर में अपनी प्रस्तुति देने के लिए पहुंचे थे। मंगलवार को इस डांस और म्युजिक फेस्टिवल का दूसरा था। इसमें पटियाला के नामी सिंगर प्रोफेसर अलंकार सिंह ने परफॉर्म किया। इसमें उन्हें तीन आर्टिस्ट ने सहयोग किया। तबलावादक दुर्जय भौमिक, हारमोनियम वादक कजेंद्र प्रसाद बैनर्जी और संगीतकार संदीप सिंह दिलरुबा ने। िपछले चालीस साल से गा रहे हैं। चार साल की उम्र में संगीत सीखना शुरु किया। प्रो. तारा सिंह उनके रोल मॉडल हैं। कहते हैं, गुरु ही रास्ता दिखाता है। गुरु के बिना कोई गद्दी नहीं। मेरी खुशकिस्मती रही कि उनसे लगातार ग्यारह साल मैंने संगीत सीखा। फिर अंबाला में रामपुर सहसवान घराने के पंडित गणेश प्रसाद शर्मा से अपनी क्लासिकल ट्रेनिंग को बेहतर किया। आज के वक्त में अपनी जड़ों से जुड़े रहना जरूरी है। हालांकि कल्चर से हटकर गाने लिखे जा रहें है जो चिंता का विषय है।
Musical Eve
टैगोर थिएटर में म्युजिक अौर डांस फेस्ट झंकार हुआ।