एक बार उनका परिचय किसी ने महज हाईकोर्ट चीफ जस्टिस के तौर पर करवा दिया। ये सुनकर वे बोले-मैं बहुत छोटी उम्र से सोशलिस्ट हूं और अपना परिचय एक सोशलिस्ट के तौर पर करवाया जाना बेहतर समझता हूं। ये थे जस्टिस राजिंदर सच्चर, जिनका 20 अप्रैल 2018 को दिल्ली में निधन हो गया था। वे इंसानी हकों के लिए लड़ते रहे। 90 की उम्र में भी वे हर उस सभा में जाने के लिए तैयार रहते थे, जहां उनकी जरूरत होती थी। उन्हें याद करने और श्रृद्धांजलि अर्पित करने के लिए सेक्टर-36 पीपल्स कन्वेंशन सेंटर में एक मीटिंग रखी गई। इसमें जस्टिस सच्चर से जुड़े लोगों ने हिस्सा लिया। ये मौका एक तरफ उनके प्रति अपनी भावनाएं जताने का था तो दूसरी तरफ उनकी शख्सियत को करीब से जानने का भी। लोगों ने अपने-अपने जीवन में उनके प्रभाव पर बात की। उनसे जुड़े किस्से सुनाए और ये बताया कि कैसे वे उनके प्रेरक बने रहे। मीिटंग में बोलने वालों में वरिष्ठ सोशलिस्ट अशोक निर्दोष, एएस पॉल, एडवोकेट बैंस, और आरएस चीमा थे। चीमा ने जस्टिस सच्चर के निधन के बाद दिल्ली में हुई बैठक के दौरान जस्टिस जसपाल सिंह की भावनाओं को लोगों तक पहुंचाया। मीटिंग मंे इस बात पर जोर दिया गया कि जिस तरह सच्चर ने जीवन भर हाशिए पर पड़े लोगों के हित में आवाज उठाई। जुल्म के खिलाफ खड़े रहे, गरीबों की मदद की, उस सबको याद रखते हुए अगर हम उनकी बताई राह पर कुछ दूर तक भी चल सकें तो यही उनके लिए सच्ची श्रृद्धांजलि होगी।
Yaad-e-Sachhar
जस्टिस राजेंद्र सच्चर का अप्रैल 20 को निधन हो गया। उन्हें याद किया चंडीगढ़ पीपल्स कन्वेंशन सेंटर में...
पयामे सच्चर.. जस्टिस जसजीत सिंह की जुबानी
-आखिरी बार जब मुलाकात हुई तो हालाते हाजरा पर तब्सरा तो लाजिम था। वे बोले- लोग बुजदिल क्यों हो गए हैं? जुबान पर ताले क्यों हैं? ये सकता सा क्यांे तारी है?
मैंने जवाब -जी चाहता है सच बोलें, क्या करें हौसला नहीं होता।
वे बोले- बशीर बद्र का शेर है। उस बेचारे का घर जला दिया गया धा फसादात में। मैंने आवाज उठाई। मेरठ गया था।
मैंने जवाब दिया- तभी तो आपको कुछ लोग मौलाना कहकर पुकारते हैं। इस पर वे बोले- 1884 के कत्लेआम के बाद कुछ लोग मुझे ज्ञानी जी भी पुकारते हैं।
आज वे होते तो कहते-
आइए हाथ उठाएं हम भी
हम जिन्हंे रस्मे दुआ याद नहीं
हम जिन्हें सोजे मुहब्बत के सिवा
कोई बुत, कोई खुदा याद नहीं
जसपाल सिंह