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छोटे बच्चे को बड़े करने जैसा होता है रियाज

3 वर्ष पहले
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संगीत में तरक्की हासिल करना घंटों की मेहनत नहीं होती। इसका रियाज दिन भर दिन करने से आवाज अच्छी होती है। जिस तरह छोटा बच्चा धीरे- धीरे बढ़ता है, रियाज भी उसी तरह हैं। एक दिन में चार घंटे रियाज करना चाहिए। बता रहीं हैं क्लासिकल वोकल सिंगर डॉ. मोनिका सोनी। वह चंडीगढ़ संगीत नाटक एकेडमी की ओर से कराए जा रहे म्युजिक और डांस फेस्ट झंकार के तहत सेक्टर-18 के टैगोर थिएटर में अपनी प्रस्तुति देने पहुंची थी। बुधवार को इस फेस्टिवल का तीसरा दिन था। इसमें तीन आर्टिस्ट ने उनका सहयोग किया। हारमोनियम मुरलीधर सोनी, तबलावादक मेहमूद और तानपुरा पर पूजा ने। बोलीं- पिछले दस साल से गा रही हूं। 17 साल की उम्र में संगीत सीखना शुरु किया था। मेरे पिता नामी लेखक रहे हैं। गाते अच्छा हैं पर कभी प्रोफेशनल गाने का मौका नहीं मिला। कई बार देखा जाता है कि म्युजिक इंडस्ट्री में घरवालों के होने की वजह से सपोर्ट मिल जाता है। बोलीं- बहुत सी प्रतियोगिताएं जीती तो लोग मेरे माता- पिता से मुझे संगीत में आगे बढ़ने को कहते थे। मैंने पीएचडी म्युजिक में की है। अभी चंडीगढ़ स्थित जीसीजी- 11 में असिस्टेंट प्रोफेसर हूं।

आजकल माना जाता है कि टेक्नोलॉजी के आगे बढ़ने से हम इंटरनेट पर सब सीख सकते हैं। यू ट्यूब जैसी वेबसाइट्स इसमें काफी मदद करती हैं। मगर संगीत की शिक्षा ऐसे प्राप्त नहीं की जा सकती। वह गुरुमुख से ही आता है। नोट्स, राग के नियम और अन्य छोटी- छोटी बातें बिना गुरु के नहीं सीखी जाती। मेरे सबसे पहले गुरु रहे बनारस के पंडित राम गोपाल त्रिपाठी। उसके बाद उदयपुर के डॉ. चटना बनावट और किराना घराने के मोनी प्रसाद। परफॉरमेंस की शुरुआत अपने गुरु की बंदिश- आयो मन ध्यान रंग पिया से की। मीराबाई का भजन पिया जी म्हारा नैणा माही रैज्यो और भैरवी से समापन किया। आलाप के बारे में बताती हैं- आलाप व्यक्ति की मैच्योरिटी को दिखाता है। मैंने इस पर लेख लिखा है। युवा के द्वारा आलाप नदी जैसी उच्च शृंखला है।

Musical Eve

टैगोर थिएटर में म्युजिक और डांस फेस्ट के जरिए सामने आए देश के लोकल आर्टिस्ट।

नौजवान क्लासिकल संगीत भूल चुके हैं

इस परफॉरमेंस को दिल्ली के नामी बांसुरीवादक प्रकाश चंद ने शुरु किया। उन्हें तबलावादक महमूद खान ने सहयोग किया। अपनी परफॉरमेंस से नौजवानों को क्लासिकल संगीत से रूबरू कराना चाहते हैं। कहते हैं- बचपन से ही संगीत सीखने की इच्छा थी। बीए म्युजिक में की। शुरुआत में गायकी की शिक्षा गुरु एनएस राठोर से मिली। वोकल म्युजिक सीखने के बाद 23 साल की उम्र से बांसुरी सीखी। मुझे फ्लूट की लय बहुत पसंद है।

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