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पीयू में गवर्नेंस रिफॉर्म का एफिडेविट मैंने खुद दिया है

3 वर्ष पहले
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पीयू के वाइस चांसलर ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में जो एफिडेविट सौंपा है, उसमें उन्होंने गवर्नेंस रिफॉर्म की बात भी उठाई है। यह केस पीयू के आर्थिक संकट से शुरू हुआ था और अभी तक पंजाब केंद्र सरकार व यूटी इसमें पार्टी बने हुए हैं। एफिडेविट पूरे कैंपस में चर्चा का विषय बना हुआ। पहले यह एफिडेविट रजिस्ट्रार कर्नल जीएस चड्ढा के नाम से तैयार हुआ था। पीयू के विभिन्न वॉट्सएप ग्रुप और सोशल मीडिया पर यही एफिडेविट चल रहा है। वीसी ने इन ग्रुप पर भी जवाब दिया है कि एफिडेविट उन्होंने खुद दिया है। सूत्रों के अनुसार वीसी की टर्म 22 जुलाई को खत्म हो रही है। जबकि रजिस्ट्रार का कार्यकाल अभी बाकी है। उनको एक्सटेंशन भी मिल सकती है। सीनेट सिंडिकेट के साथ उनका किसी भी तरह का टकराव रोकने के लिए वीसी ने बाद में इस एफिडेविट में बदलाव किया है।

कोर्ट ने खुद इस मामले में पीयू व अन्य पार्टियों को तलब किया था। अक्टूबर 2016 में दिए गए अपने एफिडेविट में बदलाव करते हुए वीसी ने अब जो एफिडेविट दिया है, उसमें उन्होंने गवर्नेंस रिफॉर्म को भी एक बड़ा मुद्दा बताया है।

सीनेट में हुए बदलाव के बारे में बताया

वीसी ने 1947 से लेकर अब तक सीनेट में हुए सभी बदलाव का हवाला दिया है। वीसी के ज्वाॅइन करने से बाद से अब तक कई बार सीनेट मेंबर्स से विवाद होता रहा है और वह कई मौकों पर गवर्नेंस रिफार्म की बात करते रहे हैं। उन्होंने एक कमेटी का गठन भी किया था। एफिडेविट में उन्होंने ग्रेजुएट के रिजल्ट सबमिट किए हैं। इनके अनुसार मात्र 10 फीसदी वोट लेने वाला व्यक्ति भी ग्रेजुएट कंस्टीट्यूएंसी से जीत जाता है। जिस समय यूनिवर्सिटी बनी थी उस समय 7 फीसदी से अधिक मेंबर नॉमिनेटेड होते थे लेकिन धीरे-धीरे इलेक्टेड मेंबर्स की संख्या बढ़ती गई। लाहौर में इनकी संख्या 75 थी। सीनेटरों को तीन फैकल्टी चुनने का ही अधिकार होना चाहिए। वोट सिर्फ मेजर फैकल्टी में करें और एडिड मेंबर्स को वोट का अधिकार नहीं होना चाहिए। इस समय कॉलेजों से और पीयू कैंपस से हर सीनेट मेंबर को लगभग दो एडिड मेंबर एक फैकल्टी में बनाने का अधिकार है।

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