एलगी यानी काई की मदद से 10 से 12 रुपए में बायोफ्यूल बन सकता है। इसलिए बड़ी मात्रा में काई तैयार करने के लिए कोमल शर्मा फोटोग्राफ बायोरिएक्टर तैयार कर रही हैं। कोमल शर्मा पंजाब यूनिवर्सिटी के बायो इंक्यूबेटर नरचरिंग एंटरप्रेन्योरशिप फाॅर स्केलिंग टेक्नोलॉजी सेंटर में इनोवेटर हैं। यह सेंटर बायोटेक्नोलॉजी इंडस्ट्री रिसर्च असिस्टेंट काउंसिल (बिराक) की मदद से चल रहा है। डिपार्टमेंट ऑफ बायोटेक्नोलॉजी गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने बिराक की स्थापना नॉन-प्रॉफिट पब्लिक सेंटर एंटरप्राइज के तौर पर की है। सेल के को-ऑर्डिनेटर डॉ. रोहित शर्मा ने बताया कि इसमें कोई भी युवा साइंटिस्ट अपना आइडिया लेकर अप्लाई कर सकता है। पहले उनको मिनिस्ट्री में सीधे अप्लाई करना होता था लेकिन अब वह सीधे संबंधित बायो इंक्यूबेटर में अप्लाई कर सकते हैं। इसी सेंटर से यूनिवर्सिटी की रिसर्च स्कॉलर और अब स्टार्टअप इंटरप्रिन्योर शिवांशी ने दो पेटेंट हासिल किए हैं। पीयू के चार ऐसे बेहतरीन स्टार्टअप्स नेशनल लेवल के कंपीटिशन में चुने गए हैं। शिवांशी वशिष्ठ बायो इंटरनेशनल काॅन्फ्रेंस में भाग लेने के लिए बॉस्टन जा रही हैं इसमें वह टीम इंडिया को रिप्रजेंट करेंगी। पूरे देश से छह स्टार्टअप इसके लिए चुने गए हैं। इस सेंटर पर इनोवेटर्स और स्टूडेंट के साथ-साथ पीयू के डिपार्टमेंट ऑफ फार्मेसी की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वंदिता कक्कड़ भी अपने इंक्यूबेशन पर काम कर रही हैं उन्हें इसके लिए 48,00,000 रुपए की ग्रांट मिली है।
वंदिता कक्कड़
बच्चों के रैशेज का साइड इफेक्ट का इलाज ढूंढें़गी
डिपार्टमेंट ऑफ फार्मेसी वंदिता कक्कड़ को बायोटेक्नोलॉजी इग्निशन ग्रांट मिली है जिसमें उनको 48 लाख रुपए की ग्रांट में से 15 लाख रुपए पहले ही मिल चुके हैं। वह नैनो लिपिड बेस नेचुरल फाइटोकेमिकल्स से ऐसी ऑइंटमेंट तैयार करेंगी, जो बच्चों की सेहत के लिए नुकसानदायक ना हो। बच्चों में शुरुआती महीनों में ही होने वाली खुजली और रेशेज के लिए इस समय दवा मौजूद है। लेकिन आमतौर पर इसके लिए स्टीरॉयड दिए जाते हैं और लगाने वाली दवाइयां भी ज्यादा कारगर नहीं है। उन्होंने सफेद करक्यूमिन की मदद से तकनीक तैयार की है। अब इसमें पीजीआई और इंडस्ट्री की मदद से वह ऐसी ऑइंटमेंट तैयार करेंगी जो सुरक्षित हो और ज्यादा प्रभावी हो। इसके बच्चों पर साइड इफेक्ट ना हो व बड़ों के लिए फायदेमंद हो।
श्रुति नागरथ
कैंसर इम्यूनो थैरेपी पर काम
कैंसर इम्यूनो थैरेपी तैयार कर रही हैं। वह माइक्रो ऑर्गेनिज्म यानी बैक्टीरिया की मदद से ऐसी दवा तैयार करने की कोशिश में है, जिससे कैंसर के ट्रीटमेंट वाली दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता पैदा ना हो। इसके जहरीले प्रभाव को कम किया जा सके और दवा कैंसर प्रभावित एरिया पर ही असर करे। वह इस को अल्टरनेट मेडिसन के तौर पर डेवलप कर रही हैं।

हाई टेम्प्रेचर पर एंजाइम्स जिंदा रखने की मशीन बनाई
माइक्रो रेडिकल 360 प्राइवेट लिमिटेड नाम से लाइफसाइंसेज बेस स्टार्टअप शुरू करने वाली शिवांशी हाई वैल्यू कमर्शियल माइक्रो ऑर्गेनिज्म को सिंथेसाइजर करके बेच रही हैं। उन्होंने बहुत हाई डिग्री टेंपरेचर पर जीवित रहने वाले एंजाइम्स को बचाने के लिए एक मशीन भी तैयार की है। फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री में इसकी काफी डिमांड है। शिवांशी के इस स्टार्टअप को नेशनल लेवल पर पहचान मिल चुकी है और अब वह बॉस्टन में भी इसे पेश करेगी।

अर्जुन की पत्तियों से कैंसर की दवा
डीएवी सेक्टर-10 में एमएससी करते हुए शालू ने अपने स्टार्टअप मृत्युंजय एलोपैथी मेडिसंस पर काम करना शुरू किया है। वह अर्जुन पेड़ की पत्तियों पर काम कर रही हैं। जिसमें एंटी कैंसर इफेक्ट है। शालू कहती हैं कि आयुर्वेद में इनका उपयोग लंबे समय से हो रहा है। लेकिन इनके काफी सारे साइड इफेक्ट भी हैं। आयुर्वेद में जो काढ़े बनाए जाते हैं उनमें काफी सारे एक्सट्रैक्ट रह जाते हैं लेकिन वह इस कोशिश में हैं कि इस का प्योर फॉर्म बनाएं जिसका कोई साइड इफेक्ट ना हो।

पानी से पॉल्यूशन को दूर करने पर काम
पीयू में पोस्ट डॉक्टरेट नवनीत ने इंजीनियरिंग में पीएचडी की है। वह इस तरह की तकनीक तैयार कर रही हैं जिससे डाई वाले पानी या पॉल्यूशन को आसानी से दूर किया जा सकेगा। उनके सिंथेसाइज किए गए फोटो कैटेलिस्ट बहुत बड़े सरफेस एरिया वाले पानी को साफ कर सकेंगे। इन फोटो कैटेलिस्ट का पानी में कोई नुकसान ना हो, इसके लिए वह ऐसी तकनीक तैयार कर रही हैं कि पानी से इनको वापस चुंबक की मदद से खींचकर निकाला जा सके।