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बाड़ ही खेत को खा रही है, फॉरेस्ट गार्ड ने पेड़ बचाने की जगह पेड़ कटवाए: हाईकोर्ट

3 वर्ष पहले
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बाढ़ ही खेत को खा रही है फिर राहत की उम्मीद क्यों की जा रही है। पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए फॉरेस्ट गार्ड की सजा के खिलाफ अपील याचिका को खारिज करते हुए की। जस्टिस राजेश बिंदल और जस्टिस बीएस वालिया की खंडपीठ ने फैसले में कहा कि फॉरेस्ट गार्ड को पेड़ों की रखवाली के लिए रखा गया था लेकिन पेड़ बचाने की जगह उसने ही पेड़ कटवा दिए। इससे न केवल विभाग की बदनामी हुई बल्कि पर्यावरण को भी भारी नुकसान हुआ। धुराला एरिया में 323 पेड़ों की कटाई पाई गई। इन आरोपों पर फॉरेस्ट गार्ड धर्मपाल के खिलाफ पहले रेगुलर इंक्वायरी की और आरोप साबित होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उसे डिसमिस कर दिया गया। इससे पहले रिकवरी के आॅर्डर भी दिए गए। अपीलेंट अथाॅरिटी ने आंशिक राहत देते हुए डिसमिस किए जाने के आदेश को खारिज करते हुए बाकी सजा को बनाए रखते हुए पांच साल तक शुरु के पे स्केल पर काम कराने के आदेश दिए। हाईकोर्ट के सिंगल बेंच ने इस मामले में कहा था कि याची के खिलाफ गंभीर आरोप हैं। दोषी पाए जाने के बाद यह नहीं कहा जा सकता कि सजा को खत्म किया जाए। अपीलेंट अथाॅरिटी ने भी सजा को कम कर जरूरी राहत पहले ही दे दी है। ऐसे में राहत नहीं दी जा सकती। फैसले के खिलाफ डबल बेंच में अपील की गई। बेंच ने कहा कि याची फॉरेस्ट गार्ड होने के नाते पेड़ों की रक्षा नहीं कर पाया। पेड़ बचाने की जगह उसने पेड़ कटवा दिए। 323 पेड़ कम पाए गए। ऐसे में सिंगल बेंच के फैसले के खिलाफ अपील को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

गिल कमीशन को चुनौती, सरकार को नोटिस जारी

चंडीगढ़ | पंजाब में शिरोमणि अकाली और बीजेपी सरकार के दौरान राजनीतिक रंजिश के चलते झूठे केस दर्ज करने को लेकर जस्टिस मेहताब सिंह गिल कमीशन के गठन को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका पर जस्टिस राजन गुप्ता ने पंजाब सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। बठिंडा निवासी सरन दास गर्ग की तरफ से दाखिल याचिका में कहा गया कि जस्टिस गिल कमीशन के पास कोई इनवेस्टीगेशन मशीनरी नहीं ती लिहाजा कमीशन की सिफारिशों का कानून की नजर में कोई महत्व नहीं है। याचिका में कहा गया कि उनके दो चेक से धोखे से दो करोड़ रुपये का नुकसान उन्हें पहुंचाया गया। मामले को लेकर पुलिस में शिकायत दी जो एफआईआर दर्ज कर ली गई। बठिंडा के चीफ ज्युडीशियल मजिस्ट्रेट ने इस मामले में जांच एजेंसी की फाइनल रिपोर्ट को मंजूर न करते हुए दोबारा जांच के आदेश दिए थे। याचिका में कहा गया कि आरोपी पक्ष ने जस्टिस गिल कमीशन को इस मामले में अप्रोच किया। कमीशन ने कहा कि इस मामले में झूठा केस दर्ज किया गया था। इसे हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया कि कमीशन के पास कोई इनवेस्टीगेशन मशीनरी नहीं है फिर वे इस तरह के नतीजे पर कैसे पहुंच सकते हैं। ऐसे में कमीशन की सिफारिशों का कानून की नजर में कोई महत्व नहीं होना चाहिए।

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