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गुरुद्वारा में धूमधाम से मना वैशाखी का पर्व

3 वर्ष पहले
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छतरपुर| सिख धर्म में वैशाखी के पर्व का इतिहास में बहुत ज्यादा महत्त्व हैं। इसी दिन सिख धर्म के वर्तमान स्वरूप का जन्म हुआ था। पहली कौम हैं, जो अपना जन्म दिवस मनाती हैं। 320 साल पहले आज के ही दिन गुरु गोविंद सिंह ने खालसा पंथ की स्थापना की थी।

राजू सरदार ने बताया इस अवसर ज्ञानी जश्मेर सिंह मोरिंडा पंजाब आए। जिन्होंने बताया कि इसी दिन गुरु जी आनंदपुर साहिब में सभी को बुलाया और भरी सभा में तलवार उठा कर कहा कि हैं कोई जो गुरु को अपना सर दे सके। इस तरह 5 बार उन्होंने सिर की मांग की तब एक के बाद एक भाई दयाराम लाहौर, धर्मचंद हस्तिनापुर, मोहकमचंद द्वारिका, हिम्मत मल उड़ीसा, साहिब चंद विदर से आए और अपना सिर गुरु को भेंट दिया।



तब गुरु जी ने अमृत तैयार किया।

इसमें भक्ति शक्ति वैराग्य विनम्रता और आनंद के प्रतिक 5 गुरुबाणी की रचनाएं पढ़ कर उसमें बतासे डलवा कर खंडे से तैयार सबको पिलाया और सबके नाम के पीछे सिंह लगाकर जाति का प्रतीक हटाकर सिंह लिखने को कहा। इसके पीछे लोगों को एक कर धर्म रक्षा के लिए तैयार करने की भावना थी। इस कार्यक्रम के बाद लंगर का आयोजन हुआ।

संचालन सरदार संपूर्ण सिंह ने किया

वैशाखी का पर्व पंजाब में मेलों के लिए भी जाना जाता हैं। लगातार कई माह खेतों में रहकर फसलों की रखवाली करने के बाद इस समय फसल पक जाती हैं और कटाई के कारण किसान लगातार मेहनत के बाद परिवार सहित इन मेलों का आनंद लेने जाता हैं। इन मेलो की विशेषता हैं कि इस अवसर पर पंजाबी लोक गीत कविशर जथा जलियावाला बाघ के शहीदों को याद करने से लेकर खालसा के जन्म तक का इतिहास भी सुनाया करते हैं।

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