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बिना कीमत लिए 110 लड़कियों की शादियों में दिखाई पेंटिग की कला

3 वर्ष पहले
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जिला मुख्यालय से 80 किलोमीटर दूर बारीगढ़ क्षेत्र के टिकरी गांव में एक युवक अपनी पेंटिग की कला दिखाते हुए गांव में हुई 110 लड़के और लड़कियों की शादियों में जाकर अपनी कला द्वारा उनके दरवाजों को चित्रों और पेंटिग से सजा चुका है। उन्होंने बताया कि इसके लिए किसी से भी एक रुपए नहीं लिए और वह खुद लकड़ी का ब्रश और रंग की व्यवस्था कर यह काम करते हैं।

टिकरी गांव के समाजसेवक बृजभान सिंह ने बताया कि मुझे बचपन से ही किताबों पर चित्र बनाने और दीवारो पर लिखने का शौक रहा है। जिससे गांव और पंचायत में कोई भी आयोजन और कार्यक्रम के प्रति गांव वालों को जागरुक करने के लिए उन्होंने कई बार दीवारों पर लिखा और चित्र बनाए। धीरे-धीरे गांव के लोगों को लगा कि वह दीवारों पर अच्छे चित्र बनाकर उन्हें सुंदर बना सकते हैं। जब भी गांव में कसी भी लड़की की शादी होती हैं तो लोग वे किसी के बुलाने का इंतजार नहीं करते। उनके घर पहुंचकर जितना अच्छा हो सकता दीवारों को सजाते हैं। गांव में लिखने के लिए ब्रश और अच्छे रंगों के न मिलने से वे किसी तरह लकड़ी के ब्रश और गांव की दुकानों में मिलने वाले निम्न क्वालिटी के रंग का उपयाेग कर दीवारों पर चित्र बनाते हैं। इसी तरह धीरे-धीरे यह प्रक्रिया चलती रही जिसके चलते पिछले 15 सालों में अब तक उन्होंने करीब गांव में हुई 110 शादियों में चित्र बना चुके हैं और आगे भी बनाते रहेंगे।

अपनी कला को जीवत रखने के लिए पिछले 15 सालों से लोगों के घरों को सजाते हैं बृजभान सिंह, खजूर की डाली के ब्रस से करते हैं पेटिंग

खजूर की डाली के ब्रस से करते हैं पेंटिग: श्री सिंह ने बताया कि यदि वे कभी शहर आए तो पेंटिग ब्रस खरीदकर ले जाते हैं। पर यह ब्रस एक बार स्तेमाल होने के बाद खराब हो जाते हैं। इसलिए वे गांव में लगे खजूर की टहनी को काटकर उसका ब्रस बनाते है और उसमें रुई को लपेटकर दरवाजे पर पेंटिग और लेखन में स्तेमाल करते हैं। इस देशी ब्रसे के इस्तेमाल करने से उनकी पेंटिग और लेखन कार्य में कोई फर्क नहीं पड़ता।

रोजगार पाने के सीखी थी पेंटिग

बृजभान सिंह ने बताया कि वह 12 वीं पास करके काई रोजगार पाना चाहते थे, लेकिन जब काई रोजगार नहीं मिला तो सोचा कि पेंटिग सीखने से हो सकता है कि कहीं रोजगार मिल जाए। इस लालसा में पेंटिंग को सीख लिया। पेंटिग करने के लिए उसने कोई शिक्षा नहीं ली है। वह अपनी कला को खोना नहीं चाहते इसलिए गांव में किसी भी जाति की लड़की की शादी हो, वे वहां पहुंचकर दरवाजों को सजाते हैं। इसके कार्य के बदले में वे किसी से कोई रुपए नहीं लेते हैं।

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