कटकऊंवा जनगल के बीच टोनहीडबरी नाव के गांव रिहीस। इहां रहवइया के सनखिया बहुत कम रिहीस। नान नान झोफड़ी म नान नान कुरिया । नदिया नरवा के सेती चारों कोती ले आये जाये के साधन सुभित्ता घला नी रहय। जनगल के बीच पैडगरी रसदा म , कांटा खुंटी के बीच , खेत खार नहाकत, अपन डेरा म पहुंचे लोगन मन। रात दिन जनगली जानवर आये के डर रहय। गांव के मनखे करा आय के भलुक बहुतेच साधन रहय। फेर ओकर मेहनत के कन्हो किम्मत नी रहय। घरो घर गाय भईंस के सेती, दूध दही मही, कन्हो बिसावय निही। दूरिहा जातिस त आवत जावत ले दिन पुर जावय अऊ किम्मत घला अउने पऊने मिलय। जंगल म बड़ फल फरही। इहां के मनखे मन, असाढ़ ले कुंवार तक खेती किसानी, तहन कातिक म छीताफल अऊ आंवरा हर्रा , अघ्घन म जाम अऊ कंदमूल बोईर, पूस म पपीता, मांघ म लाख, फागुन चइत म मउहा, बइसाख म चार तेंदू आमा अमली, बेंच के कइसनो करके अपन जीविका चला डरय । अतेक मेहनत के बाद भी जब येमन अपन सकेले समान फल फलहरी ला बेंचे बर जावय, त फकत लूट के सिकार होय बपरा मन । एक पैली चिरौंजी के बदला, एक पैली नून मिलय इनला। तेकर सेती अमीर धरती के ये मनखे मनले, गरीबी पिछा नी छोंड़त रहय। इही गांव के , चैतू नाव के मनखे हा अबड़ सऊखिन रहय। ओहा न केवल अपन सकले समान, बल्कि गांव के अऊ मनखे मन के घला समान बेंचे के खातिर, सहर जातेच रहय। एक बेर सहर जावत समे खेत के मेड़ म रेंगत, ओकर गोड़ म कांटा खुसरगे । कांटा ओला अबड़ परेसान करिस। कांटा के सेती बपरा चैतू के सहर जाये म बिराम लगगे। बहुतेच दिन घर बइठे बर परगे, बपरा के बड़ नकसान होइस। कांटा के कस्ट , पांव बर पनही, बिसाये के हिम्मत दिस। जे दिन दरद कमतिअइस, उहीच दिन, परोसी के मउहा बेंचे के बहाना सहर चल दिस अऊ पनही बिसा डरिस। हंसी मजाक के बीच, महर महर बगरे मउहा के गंध पाके, दू ठिन भालू पहुंचगे। चैतू अऊ ओकर संगवारी उप्पर हमला बोल दिस। टुकनी ला उही तिर पटक के, रटपट पल्ला छांड़ गांव कोती दऊंड़िन। चैतू के पनही उही तिर छुटगे। पनही पनही रटत, गांव पहुंचगे। पनही बर पछतावत फकत पनही के गोठ करत संगवारी मन संग लिम चौरा म, उदास बइठे रहय चैतू हा, पनही बर पछतावत देखे संगवारी कथे- पनही के चक्कर म , तोरो पांव अइसने चल देतिस बाबू, तब तय पनही ला का करते? घेरी बेरी पछता झिन बाबू , पांव रहि त पनही के का दुकाल।
हरिशंकर गजानंद देवांगन , छुरा
कहानी