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11,552 यूनिट रक्त संग्रह व Rs.1.10 करोड़ से ब्लड कंपोनेंट यूनिट का काम शुरू, अब एक यूनिट खून बचाएगा 4 जान

3 वर्ष पहले
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भास्कर संवाददाता | चित्तौड़गढ़

श्रीसांवलियाजी राजकीय सामान्य अस्पताल में बहुप्रतिक्षित ब्लड कंपोनेंट यूनिट का निर्माण शुरू हो गया है। इस पर करीब 1.10 करोड़ रुपए खर्च होंगे। संबंधित मशीनें पहुंच गई है। तीन-चार महीने में यूनिट का संचालन शुरू हो जाएगा। बड़ा फायदा यह होगा कि अब एक यूनिट रक्त से चार जनों की जिंदगी बचाई जा सकेंगी। केवल खून या प्लेटलेट्स चढ़ाने के लिए मरीजों को रैफर नहीं करना पड़ेगा। खास बात यह कि यह सौगात शहर सहित जिले में रक्तदान के प्रति बने माहौल व जागरुकता के कारण मिली है।

जिला अस्पताल के ब्लड बैंक में कंपोनेंट यूनिट लगवाने की मांग और प्रयास लंबे समय से चल रहे थे। सरकार का नियम है कि एक साल में 10 हजार यूनिट रक्तदान वाले ब्लड बैंक में इस यूनिट की मंजूरी दी जाती है। नियमित रक्तदान करने वाले लोगों व संस्थाओं ने इस मापदंड को पूरा करने की ठान ली।

3-4 महीने में शुरू हो जाएगा यूनिट का संचालन

पिछले वर्ष के बजट में मिली थी मंजूरी... वर्ष 2016 में रिकाॅर्ड 11552 यूनिट रक्तदान कर इस अस्पताल को कंपोनेंट यूनिट का हकदार बना दिया। सीएम ने 2017 के बजट में हमारे सहित सात-आठ अस्पतालों को कंपोनेंट यूनिट की मंजूरी दी। हालांकि इसके बाद भी देरी होती रही पर गत महीनों में कंपोनेंट यूनिट का निर्माण शुरू हा़े गया। ब्लड बैंक प्रभारी डा. अनिल सैनी के अनुसार मशीनें भी आ गई है।

जानिए...रक्तदान और ब्लड सेपरेशन यूनिट के बारे में

यूं मिशन बना कंपोनेंट यूनिट लाना...40 बार रक्तदान कर चुके पूर्व पार्षद देवीलाल राठौर ने दैनिक भास्कर के माध्यम से आवाज उठाई। सोशल मीडिया से आचार्य तुलसी ब्लड फाउंडेशन ने जागरुकता बढ़ाई। जनप्रतिनिधियों, अस्पताल प्रशासन व दैनिक भास्कर मापदंड पूरा करने के प्रयास में जुटे। वर्ष 2016 में सांसद सीपी जोशी के जन्म दिन पर 631 यूनिट रक्तदान हुआ। वर्ष 2016 में 11,552 यूनिट रक्तदान के साथ हमारा अस्पताल हकदार बन गया।

रक्तदान : 18 से 60 साल तक का कोई भी स्वस्थ व्यक्ति रक्तदान कर सकता है। वजन 45 से अधिक हो। टीबी, कैंसर, एड्स सहित गंभीर रोगी रक्तदान नहीं कर सकता है।

पूरे ब्लड की जरूरत नहीं होती : ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. अनिल सैनी के अनुसार थैलेसीमिया व एनीमिया मरीजों को आरबीसी (लाल रक्त कणिकाएं), डेंगू, मलेरिया व थ्रोम्बोसाइटोपीनिया के मरीजों को प्लेटलेट्स, कैंसर पीड़ित और जलने वालों को प्लाज्मा एफएफपी एड्स के मरीजों को डब्ल्यूबीसी (श्वेत रक्त कणिकाएं) की जरूरत होती है। ये तत्व नहीं मिलने पर पूरा ब्लड चढ़ाया जाता है। जो बेकार जाने के साथ कई बार मरीजों को परेशानी भी हो जाती है। सेपरेशन मशीन ब्लड में मौजूद इन सभी तत्वों को अलग-अलग करती है।

कंपोनेंट यूनिट निर्माण शुरू हो गया है। मशीनें भी पहुंच गई है। करीब 50 लाख से निर्माण होगा। इक्यूपमेंट पर 60 लाख रुपया खर्च होगा। उम्मीद है कि तीन महीने में यूनिट का संचालन शुरू होगा। -डॉ. मधुप बक्षी, पीएमओ, श्रीसांवलियाजी राजकीय सामान्य अस्पताल

ऐसे बचेगी जान : ब्लड सेपरेशन यूनिट यानी कंपोनेंट यूनिट के बाद रक्त से आरबीसी, प्लाज्मा और प्लेटलेट्स, अलग-अलग किए जा सकते हैं। एक यूनिट रक्त से चार लोगों की जान बचाई जा सकेंगी है।

सिर्फ 7 जिला अस्पतालों में है यूनिट... ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. अनिल सैनी के अनुसार अब तक प्रदेश के सात जिला अस्पतालों में ही कंपोनेंट यूनिट है। हमारा जिला आठवां होगा। लैब टेक्नीशियन लीला शंकर ने बताया कि रक्तदान से दो फायदे है। दूसरे की जान बचाई जाती है। खुद की किसी बीमारी का भी पता लग जाता है। शहर चारों ओर से फोरलेन हाईवे और ब्रॉडगेज रेलवे से जुड़ा है। खनन व बड़े उद्योगों के साथ पर्यटन जिला होने से भी ट्रैफिक दबाव रहता है।

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