बाड़मेर | जिले में मीठे पानी की योजनाएं कई तैयार की गई, लेकिन सालों बाद भी दूर-दराज के गांव व ढाणियों तक नहरी पानी नहीं पहुंचा है। इसकी वजह योजनाओं के काम की धीमी रफ्तार। नर्मदा नहर परियोजना से चौहटन, रामसर व गडरारोड क्षेत्र सरहदी गांवों में नहरी पानी पहुंचाने की कवायद चल रही है। जिम्मेदारों की लापरवाही से पेयजल परियोजनाओं का काम तीन साल बाद भी अधूरा है। पहले सरकार ने बजट जारी करने में देरी कर दी और अब ठेकेदार काम की रफ्तार नहीं बढ़ा रहे है। ऐसे में सरहदी गांवों के लोग बेरियों से पानी सींचकर प्यास बुझाने को मजबूर है। 45 डिग्री तापमान में पुरुष व महिलाओं को बेरियों से पानी निकालने की मशक्कत करनी पड़ रही है। हालात यह है कि बेरियों का पानी रसातल पहुंच गया है। ऐसे में ग्रामीणों को बेरियों के अंदर उतरकर पानी का जुगाड़ करना पड़ रहा है। सरहदी गांव चांदे का पार में स्थित बेरियों का पानी 100 फीट गहरा है। इसकी वजह भूजल स्तर में लगातार गिरावट आना है। इस विकट स्थिति में ग्रामीणों को बेरियों के अंदर उतरकर पाताल से पानी की बूंद-बूंद सहेजने के जतन करने पड़ रहे हैं।
तस्वीर क्यों और कैसे जानिये
बॉर्डर के अधिकतर गांवों में पानी सबसे बड़ी चुनौती बना है। इन गांवों में जलदाय विभाग का पूरा सिस्टम ही फेल है। जीएलआर बने है और पाइप लाइने बिछी है, लेकिन जलापूर्ति बंद है। हजारों ग्रामीणों का दर्द सिस्टम को बताने के लिए भास्कर फोटो जर्नलिस्ट सौ फीट गहरी बेरी में उतरा। भास्कर ने सात दिन तक सरहदी गांवों में पेयजल व्यवस्था को देखने के बाद पाठकों के लिए चांदे का पार गांव से तस्वीरें ली है। पहली तस्वीर अंदर से ऊपर की। दूसरी एक ग्रामीण की ओर से ली गई ऊपर से सौ फीट गहरी बेरी के अंदर की। फोटो: नरपत रामावत