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आखिर मोदी की लोकप्रियता का रहस्य क्या है?

3 वर्ष पहले
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पिछले कुछ वर्षों के दौरान चुनाव से गुजर रहे राज्यों की यात्रा का निष्कर्ष है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता लगातार बनी हुई है। लोग बढ़ती कीमतों (खासतौर पर पेट्रोल-डीज़ल), किसानों की समस्या, बेरोजगारी, कारोबार के नुकसान, नोटबंदी, जीएसटी आदि से नाराज जरूर हैं। इस गुस्से का काफी कुछ भाजपा को भी झेलना पड़ा है।

वंशों, विशेषाधिकारों और ‘पृष्ठभूमि’ के प्रभुत्व वाली व्यवस्था में मोदी सिर्फ अपने बल पर बने नेता भर नहीं हैं। वे सेल्फ-मेड सुपरब्रैंड हैं और बड़ी संख्या में भारतीय उन्हें पूजते हैं फिर चाहे उनकी राजनीति और अर्थशास्त्र कुछ भी क्यों न हो। ऐसा नहीं है कि वे सर्वमान्य नेता हों। कई उन्हें नापसंद करते हैं जैसे अल्पसंख्यक, प्रतिबद्ध समाजवादी और अब, उत्तरोत्तर दलित भी। लेकिन, इतने दशकों में देश के भीतरी भागों में दीवार पर लिखी इबारत पढ़ने के लिए भटकते हुए मैंने ऐसा कुछ नहीं देखा।

राजीव गांधी (मोदी से) अधिक लोकप्रिय थे और पहले 18 माह में उनसे कोई गलती नहीं हुई लेकिन, फिर उनका घोर पतन हुआ। शुरुआती 18 माह में राजीव कुछ भी कहते तो हमारी माताओं की आंखों में आंसू अा जाते। 19वें माह से आगे वे कुछ भी कहते तो हमारे बच्चे हंसने लगते। सत्ताविरोधी रुख हर नेता पर असर डालता है। क्या मोदी पर यह लागू नहीं होता? देश के मुख्य न्यायाधीश, राष्ट्रपति, चुनाव आयुक्त और पत्रकार हर कोई वोट देता है। क्या आप अपने मतदान की प्राथमिकताओं को आपके आकलन पर हावी होने देते हैं? दूसरा प्रश्न टाइमिंग को लेकर है। क्या हम कर्नाटक में पार्टी को बहुमत दिलाने में मोदी की नाकामी के एक हफ्ते के भीतर और अपने गृह प्रदेश में पार्टी को मामूली बहुमत से सत्ता में लौटाने के एक माह बाद यह कह सकते हैं? क्या इससे नहीं लगता कि पार्टी की लोकप्रियता घट रही है? जवाब है ‘हां’। भाजपा ने कुछ गिरावट देखी है पर प्रधानमंत्री ने नहीं। गुजरात और अब कर्नाटक में मोदी के आने तक सहमति थी कि भाजपा इन्हें गंवा चुकी है। कल्पना करें कि अंतिम चरण में वे जोर नहीं लगाते तो क्या होता? दोनों राज्यों में स्थानीय नेता विजय रूपाणी और येद्दीयुरप्पा बोझ ही थे। उत्तर प्रदेश, गुजरात व कर्नाटक में मोदी ने खुद के लिए वोट मांगे। राहुल गांधी ने गुजरात व उत्तर प्रदेश में मोदी के खिलाफ और कर्नाटक में सिद्धारमैया के लिए वोट मांगे। यह हारी हुई बाजी थी।

क्या कोई नेता अपनी ही पार्टी की छवि से खुद को इतना अलग रख सकता है? तथ्य हमारे सामने हैं। अर्थव्यवस्था संघर्षरत है, नौकरियों का पता नहीं है, रणनीतिक स्थिति खासतौर पर पड़ोस में और खराब हुई है, सामाजिक एकजुटता तनाव में है और बहुत सारे लोग तकलीफ में हैं। फिर भी पर्याप्त लोग उन्हें वोट देते रहते हैं, तब भी जब उनके अग्रिम मोर्चे के लोग बेजान हैं। मेरे मन में सवाल था कि ऐसा कैसे हो सकता है? कर्नाटक में घूमते हुए जवाब मिला। शिराहट्टी चुनाव क्षेत्र और गडग जिले के बीच एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज के बाहर कुछ छात्राएं गांव जाने के लिए बस का इंतजार कर रही थीं। वे करीब 18 साल की थीं तो इस या अगले साल पहली बार वोट देने वाली थीं। बातचीत में वही जवाब मिले, जो इतने मिलत-जुलते थे कि मैंने फोन पर वीडियो बना लिया। हर छात्रा ने कहा कि वहं भाजपा को वोट देगी पर मोदी के कारण। क्यों? ‘क्योंकि स्वच्छ भारत ने काम किया। मेरा गांव भी 75 फीसदी स्वच्छ हो गया, हम डिजिटल इंडिया बन गए, उन्होंने दुनिया में भारत की छवि चमकाई और सबसे बड़ी बात भ्रष्टाचार खत्म कर दिया।’ बहस करने का मतलब नहीं था, क्योंकि वे इसे ही सत्य मानती थीं। राहुल गांधी के बारे में क्या ख्याल है? ‘वे जरूर अच्छे आदमी होंगे, लेकिन मैं उन्हें ज्यादा नहीं जानती।’ तो बात ऐसी नहीं है कि मैं मोदी को पसंद करती हूं और राहुल को नापसंद। एक नेता के रूप में मैं सिर्फ मोदी को जानती हूं। उनके बारे में ही मैंने सुना है।

2014 के चुनाव के बाद मैंने लिखा था कि नए युवाओं को विचारधारा पर यकीन नहीं है और न राजनीतिक वंशों को लेकर कोई मोह, फिर चाहे जो बलिदान उन्होंने किए हों। वहां तो मोदी ही एकमात्र नेता हैं। कर्नाटक, गुजरात और उत्तर प्रदेश में बातचीत से इस अखिल भारतीय तथ्य की पुष्टि होती है। वयस्कों में ज्यादातर ने पुरानी वफादारियां छोड़ी नहीं हैं। इसीलिए मोदी के प्रतिद्वंद्वियों को बड़ी संख्या में वोट मिलते हैं लेकिन, युवा अब अलग ही मतदाता वर्ग है। अगले साल ऐसे 14 करोड़ और होंगे। विभाजन होगा लेकिन, मोटेतौर पर उनका समर्पण मोदीवाद के लिए ही होगा। मोदी ने यह कैसे किया? उन्होंने नए प्रकार का संदेश देने में महारत हासिल की है, जिसमें वे हमारेे लिए अच्छी चीजें तय करते हैं : स्वच्छता, ईमानदारी, शिक्षा, टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल लेकिन, इन्हें करने की जिम्मेदारी हम पर होती है। वे खुद के लिए ऐसे लक्ष्य तय नहीं करते कि आप उनका आकलन कर सकें। सफाई आपको करनी है, डिजिटल नकदी का इस्तेमाल आपको करना है, स्मार्टफोन का उपयोग सीखना है। कोई झटका लगे तो वे मौन रहते हैं। वे कठुआ पर कुछ नहीं कहेंगे पर बाद में ‘बेटियों’ को सुरक्षा देने और ‘बेटों’ को सुधारने की बात करेंगे। वे उना (गुजरात) पर नहीं बोलेंगे पर बाद में गहरी पीड़ा जताकर कहेंगे मुझे मारो पर मेरे दलित भाइयों को मत मारो। इससे वे बुरी खबर से दूरी बना लेते हैं। वे कभी बचाव की मुद्रा में नहीं होते। वे हमेशा नैतिक ऊंचाई पर होते हैं।

जवाबदेह ठहराए जाने के बजाय वे अपने आसपास जैसे एक पंथ खड़ा कर रहे हैं। नोटबंदी का उनका फैसला चीन में चीड़ियां के खिलाफ माओ के युद्ध जैसा ही विनाशकारी था। किंतु उनका संदेश सरल-सा था : भारत को बेहतर बनाने के लिए क्या आप थोड़ा कष्ट सहन नहीं करेंगे? सच है कि हर किसी को यह हजम नहीं होता लेकिन, स्वीकारने वाले पर्याप्त हंै। और रोजगार के संघर्ष में अभी नहीं फंसे नए युवाओं को यह पसंद है। मोदी हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में सर्वाधिक ध्रुवीकरण करने वाले नेता हैं। जो उनके विरोधी हैं, जिन्हें उनसे नफरत हैं, उन्हें मेरी दलील भी पसंद नहीं आएगी। लेकिन, राजनीति यानी वास्तविकता को स्वीकार कर उससे निपटने का तरीका खोजने का नाम है। आप चाहे तो घातक सुस्ती दिखाकर गुजरात और कर्नाटक में भाजपा के संघर्ष को 2019 तक खींच सकते हैं। (ये लेखक के अपने विचार हैं।)



शेखर गुप्ता

एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’

Twitter@ShekharGupta

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