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दो शिशु रोग विशेषज्ञ पहले ही चले गए, बचे एक ने भी छोड़ा जिला अस्पताल, इलाज बंद

3 वर्ष पहले
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500 मरीज की क्षमता वाले धमतरी जिला अस्पताल में पिछले तीन दिन से बच्चों का इलाज नहीं हो रहा है, क्योंकि यहां शिशु रोग विशेषज्ञ तो दूर अब यहां शिशुओं के लिए एक भी डॉक्टर नहीं है। शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. बीके साहू का 8 माह पहले ट्रांसफर हो चुका है। बचे दो डॉक्टरों में डॉ. अखिलेश देवांगन 15 मई से नौकरी छोड़ दी है और डॉ. सीएल साहू एक माह पहले ही स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले चुके हैं।

जिला अस्पताल में बच्चों के डॉक्टर नहीं हैं, इसकी जानकारी जिस मरीज को नहीं होती वह दस रुपए की ओपीडी पर्ची तो कटवा लेता है लेकिन उसे अपने बच्चे का इलाज कराए बिना ही मायूस होकर लौटना पड़ता है। शनिवार को 30 लोगों को अपने बच्चों को बिना इलाज कराए लौटना पड़ा। जिला अस्पताल में पहले प्रतिदिन 90 से 110 शिशुओं का इलाज होता था। यहां धमतरी जिले के अलावा कांकेर, बालोद, अभनपुर, गरियाबंद जिले तक के मरीज इलाज कराने आते हैं। जिला अस्पताल में 9 माह से डाक्टर नहीं हैं। हालांकि ऐसा पहली बार हुआ है कि यहां शिशु रोग के डॉक्टर नहीं है। डॉ. सीएल साहू वालिंटियर रिटायरमेंट लेने के लिए आवेदन देकर चले गए। डॉ. अखिलेश देवांगन एकम फाउंडेशन ज्वाइन करने जा रहे हैं। शिशु रोग विशेषज्ञ न होने से दूर गांव से आने वाले गरीब लोगों को मजबूरी में निजी अस्पताल जाना पड़ रहा है, जहां उन्हें पैसे खर्च करने पड़ रहे हैं। गरीबों के लिए कोई विकल्प नहीं रह गया है।

धमतरी। दोपहर 12 बजे तक अभिभावक डॉक्टर का इंतजार करते रहे और फिर नाराज होकर लौट गए।

शिशु विशेषज्ञ नहीं, यह कोई बताता भी नहीं

बोरिदकला के टकेश्वर सिन्हा अपने 8 माह के बच्चे वेद सिन्हा को लेकर पहुंचे थे। सोरम की डुमेश्वरी साहू एक साल की बच्ची भव्या साहू को लेकर पहुंची थी। पोटियाडीह के भागवत पटेल अपने एक साल के बच्चे प्रदीप पटेल को लेकर पहुंचा था। इसी तरह लोग रोज लोग इंतिजार के बाद चले जाते है।

खाली हो गया शिशु रोग विशेषज्ञ का पद

सिविल सर्जन डॉ. पीएस ठाकुर ने कहा कि डॉ. अखिलेश देवांगन 15 मई से नहीं आ रहे हैं। शिशु रोग के डॉक्टर का पद पूरी तरह से खाली हो गया है। इसकी जानकारी संचालनालय को भेज दी है। लोकल स्तर पर भर्ती के लिए वेकेंसी निकाली थी, लेकिन निजी डॉक्टर यहां नहीं आ रहे।

क्या हो रही परेशानी, लोगों की जुबानी

कर्ज लेकर कराना पड़ रहा बच्चों का इलाज

शनिवार को जिला अस्पताल में अपने बच्चों का इलाज कराने पहुंचे पुरूर की माया ध्रुव, रूद्री की गोमती साहू ने कहा कि इतने बड़े अस्पताल में बच्चों का इलाज नहीं हो रहा है, लेकिन पर्ची काटी जा रही है। डॉक्टर नहीं है, तो अस्पताल को बंद कर देना चाहिए। आखिर गरीब आदमी कहां जाए, उनकी चिंता करने वाला कोई नहीं है। गरीब आदमी को कर्ज लेकर अपने बच्चे का इलाज निजी अस्पताल में कराना पड़ रहा है।

रोज आ रहे अस्पताल पर डॉक्टर ही नहीं

रामपुर वार्ड निवासी इंद्रकुमार बुखार से पीड़ित अपनी बच्ची उपासना साहू लेकर पहुंचे थे। उन्होंने बताया कि दो दिन से वे आ रहे, पर डॉक्टर नहीं मिल रहे।

डॉक्टरों की कमी पर एनएचएम से बात करेंगे

कलेक्टर डॉ. सीआर प्रसन्ना ने कहा कि जिला अस्पताल में डॉक्टरों की कमी के संबंध में एनएचएम (नेशनल हेल्थ मिशन) से बात करेंगे। इस मामले में स्वास्थ्य मंत्री अजय चंद्राकर और स्वास्थ्य सचिव सुब्रत साहू पहले ही कह चुके हैं कि डॉक्टरों का काम छोड़कर जाना और डॉक्टरों की कमी पुरानी समस्या है। इसे हल करने का प्रयास शासन स्तर पर किया जा रहा है।

8 माह में 8 डॉक्टर छोड़ चुके अस्पताल

डॉक्टरों के रवानगी का सिलसिला 8 महीने पहले शुरू हुआ। सबसे पहले सर्जन डॉ. बिसेन, डॉ. एआर टोंडर, डॉ. बीके साहू, मेडिकल स्पेशलिस्ट डॉ. संजय वानखेड़े, हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. विनोद पांडेय का स्थानांतरण हुआ। वर्क लोड के कारण गायनोकोलॉजिस्ट डॉ. हीना अहमद और शिशु रोग डॉ. सीएल साहू स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति आवेदन देकर चले गए। एक महिला चिकित्सा डॉ. तिवारी की पदस्थापना हुई, लेकिन वह एक दिन बाद ही चली गईं।

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