बच्चों ने कहा... सर! हमलोगों को बहुत दिनों से रोटी नहीं मिली है, हार्लिक्स मिलता है, लेकिन लगता है कि गर्म पानी पी रहे हैं
राज्य के अनुसूचित जाति के बच्चों को सरकार के द्वारा आवासीय सुविधा देते हुए शिक्षा की व्यवस्था को लेकर राजकीय अनुसूचित जाति आवासीय उच्च विद्यालयों को गठन किया गया है। धनबाद के गोविंदपुर प्रखंड में पड़ने वाले तथा कमल कटेसरिया स्कूल के आगे स्थित इस आवासीय विद्यालय की स्थिति इतनी जर्जर हाे चुकी है कि यहां के बच्चों की स्थिति देखकर किसी को माया आ जाए। लेकिन प्रशासन है कि उसे कभी इन पर दया नहीं आती है। तभी तो बिना पंखा के बच्चे रहते है और फर्श इतना खराब की उस पर चलना भी मुश्किल है। सरकार सुविधाएं देने में कभी कोताही नहीं करती है लेकिन उसे धरातल पर लागू करने के लिए स्थानीय प्रशासन सही पहल नहीं करता है। तभी तो लाखों खर्च होने के बाद भी यह आवासीय विद्यालय अपनी कुव्यवस्था के लिए जाना जाने लगा है। डीबी स्टार की टीम को देखते ही बच्चों ने कहना शुरू कर दिया कि सर हमलोगों ने कई दिनों से रोटी नहीं खाया है। अंडा भी कम मिलता है और जब हार्लिक्स मिलता है तो लगता है कि गर्म पानी पी रहे हैं। हार्लिक्स की मात्रा काफी कम रहती है। दिन में मेन्यू में जो खाना है वह तो मिल जाता है लेकिन रात में नहीं। रात में भी हमलोगों को चावल ही खाने के लिए मिलता है रोटी मांगते है तो कहा जाता है कि स्टाफ कम है अभी रोटी नहीं मिलेगा। बच्चों ने काफी उत्सुकता से पूछा कि सर हमलोगों को रोटी कब मिलेगा।
हॉस्टल में नहीं लगे हैं पंखे, बच्चों ने पंखों को बना दिया डंबल
हॉस्टल का डीबी स्टार ने निरीक्षण किया तो पाया गया कि पंखे नहीं है कहीं लटक भी रहे है तो उसका कनेक्शन नहीं है। वहीं कई जगहों पर देखा गया कि बच्चों ने दो पंखों को जोड़कर डंबल बना दिया। कहते है कि जब चलता ही नहीं है तो हमलोग इससे बॉडी बनाते है। गर्मी काफी लगता है दिन तो किसी तरह से कट जाता है लेकिन रात में मच्छर और गर्मी से हमलोग परेशान रहते हैं।
हॉस्टल के पीछे की गंदगी फैला रही है बीमारी
हॉस्टल के ठीक पीछे ऐसी गंदगी है जिससे वहां के बच्चे कभी भी बीमार पड़ सकते है। नालियों में भी कचरा भरा पड़ा है। शायद उसकी सफाई नहीं होती है। बच्चों ने बताया कि पीछे की गंदगी से दुर्गंध आती रहती है इसलिए खिड़कियों को हमलोग बंद कर देते है।
कुछ तो काम आया पंखा
विद्यालय में पंखा तो दे दिया गया, पर मेंटेनेंस की वजह से खराब होने पर छात्रों ने दो पंखे को जोड़कर डंबल बना दिया। जो कि अब शरीर बनाने के काम लाया जा रहा।
वार्डन और प्रिंसिपल नहीं सुनते हैं बात
जर्जर होता आवासीय विद्यालय।
हॉस्टल के उपर टूटी हुई टंकी।
िबना दरवाजा व पानी का शौचालय, जहां फैली रहती है गंदगी।
खेल तो हर जगह खेला जा सकता है
पंखा का उपयोग तो कर लिया गया। अब जहां पंखा लटकता था उसका भी उपयोग करना जरूरी था। सो छात्रों ने अपनी सेहत बनाने का पुरा इंतजाम कर लिया।
राजकीय अनुसूचित जाति आवासीय उच्च विद्यालय के बच्चे रह रहें हैं काफी परेशानी में
क्या है मामला
दरअसल उक्त आवासीय विद्यालय में फिलहाल 170 बच्चे रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। जबकि यहां की क्षमता 248 बच्चों की है। हॉस्टल में लगे बेड और उसके अंदर की स्थिति देखने से ही लगता है कि काफी लंबे अरसे से इसका रंग-रोगन नहीं कराया गया है और ना ही फर्श की मरम्मत हुई है। क्योंकि फर्श पूरी तरह से टूट चुका है। गंदगी जहां-तहां बिखरी पड़ी रहती है। लगता है जैसे इसकी सफाई नहीं हुई है। भवन पूरी तरह से जर्जर होते जा रहा है। कई जगह से दीवारें टूट चुकी है या दरक चुकी है। फिर भी बच्चे इसी हॉस्टल में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। चूंकि बच्चे दलित वर्ग से आते है इसलिए वे अपनी आवाज उपर तक नहीं ले जा पाते हैं।
अधिकारी आते हैं लेकिन उनका नहीं जाता है ध्यान | इस विद्यालय में समय समय पर वरीय अधिकारी भी आते रहते है लेकिन उनका ध्यान यहां की कुव्यवस्था पर नहीं जाता है। शनिवार को भी जिले के कई वरीय पदाधिकारी बाबा साहब की जयंती मनाने के लिए यहां आए लेकिन कार्यक्रम मनाकर चले गए।
टंकी है टूटी इसलिए बाथरूम का नहीं करते हैं इस्तेमाल बच्चों ने ही दिखाया कि हॉस्टल की छत पर लगा पानी का टंकी आधा टूटा हुआ है। बाथरूम में पानी नहीं आता है। इस वजह से बच्चे बाथरूम में नहीं नहाते है बल्कि बाहर लगे दो चापानलों पर ही जाकर स्नान करते हैं। बाथरूम की स्थिति काफी खराब दिखाई दी।
वायरिंग नहीं होने से लाखों रुपए
का हॉस्टल हो रहा बर्बाद
ऐसा नहीं है कि सरकार इन बच्चों के बारे में नहीं सोची है। वर्ष 2009 में ही लाखों रुपए की लागत से आधुनिक हॉस्टल का निर्माण कराया गया जिसमें किचन की सुविधा, डाइनिंग हॉल सहित अच्छे कमरे बनाए गए। लेकिन आश्चर्य की बात तो यह है कि उसमें अब-तक वायरिंग नहीं हुआ है। बिजली नहीं रहने की वजह से बच्चों को उसमें शिफ्ट नहीं किया जा रहा है। इतने लंबे समय से बनकर तैयार इस हॉस्टल का इस्तेमाल नहीं होने से भी वज जर्जर होता जा रहा है।
वायरिंग नहीं हुई है, वरना बच्चों को उसमें शिफ्ट कर दिया जाता
नया हॉस्टल वर्ष 2009 से ही बनकर तैयार है लेकिन उसमें वायरिंग ही नहीं है तो बच्चों को कैसे शिफ्ट किया जाए। वहीं पुराने हॉस्टल में पंखे है। बच्चों को खेलने के लिए गेंद उपलब्ध कराया जाता है। रोटी नहीं मिलने की बात पर कहा कि ऐसी बात नहीं है। बच्चों को सारी सुविधाएं दी जाती है। उन्हें कोई परेशानी नहीं है।\\\'\\\' रीता कुमारी, प्रिंसिपल, राजकीय अनुसूचित जाति आवासीय उच्च विद्यालय, गोविंदपुर, धनबाद।
हॉस्टल के पीछे बजबजाती गंदगी।
ऐसी स्थिति में रहने को मजबूर हैं बच्चे
इतनी बदत्तर स्थिति में रहने को मजबूर हैं विद्यालय के छात्र, कहने को तो सरकार हर सुविधा मुहैया करवाती है पर जांच करने पर असली स्थिति पता चलती है।
वायरिंग बिना बर्बाद होता हॉस्टल। फोटो : अमित कुमार