स्टेज में लगी थी डॉ. भीमराव आंबेडकर की होर्डिंग जय भीम के नारों के बीच पूरी हुई शादी की रस्में
शादी-ब्याह मतलब धूम-धड़ाका, रस्म रिवाज, बैंड बाजा। सामान्य तौर पर प्राय: वैवाहिक आयोजनों में ऐसा ही होता है। लेकिन सोमवार को बिहार के नवादा में एक अनोखा विवाह हुआ, जिसने धू-धड़ाके से दूर समाज को एक संदेश देने का प्रयास किया गया। इस विवाह में न तो बैंड बाजा था और ना ही वैदिक मंत्रोच्चार की गूंज थी। विवाह के लिए न तो विवाह मंडप बने थे और ना ही दूल्हा-दुल्हन के लिए हल्दी की रस्म हुई। विवाह समारोह के लिए बने स्टेट की भी अलग ही खासियत थी। स्टेज पर फुल- मालाओं के साथ-साथ एक तरफ महात्मा बुद्ध और दूसरी तरफ डॉ भीम राव अंबेडकर के बड़े-बड़े चित्र लग हुए थे। इस शादी की एक और खासियत यह रही कि वैवाहिक प्रक्रिया के दौरान देवी-देवताओं के बजाए बाबा साहब व जय भीम गूंजता रहा। यह विवाह भेलाटांड़ निवासी पांचू राम के पुत्र अमित कुमार का नवादा निवासी पप्पू रविदास की पुत्री खुशबू के साथ हुआ। इस अनोखे विवाह के गवाह बाराती पक्ष और वधु पक्ष बने।
भेलाटांड़ के युवक की नवादा में हुई शादी, मंडप की जगह स्टेज पर ही पूरी की गई विवाह की सारी रस्में
शादी के लिए स्टेज पर बैठे दुल्हा-दुल्हन।
विवाह में अक्षत बरसाने की थी मनाही
इतना ही नहीं शादी-ब्याह के दौरान जयमाला, सिंदूर दान व सात फेरों जैसी रस्मों के समय दूल्हा-दुल्हन पर परिजन व मौजूद लोग फूल और अक्षत की बरसात करते हैं, लेकिन इस शादी में फूल बरसाने की इजाजत तो थी, लेकिन अक्षत (चावल) की मनाही थी। इसके पीछे दोनों पक्षों का तर्क था कि धान की फसल तैयार करने में किसानों को छह माह की कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, इसके बाद अन्न उपजता है। हम अन्न को यू हीं बर्बाद नहीं कर सकते। विवाह समारोह में शामिल लोगों की मानें तो सामान्य रूप से वैवाहिक आयोजनों में कई विधि-विधान व रस्में भी होती है, लेकिन इस शादी में ऐसा कुछ भी नहीं था। वैवाहिक प्रक्रिया में सिंदूर का उपयोग भी नहीं किया गया। साथ ही सारी वैवाहिक प्रक्रिया दुल्हन के आंगन में बने मंडप में ही होता है, लेकिन यहां शादी मंडप की बजाए स्टेज पर ही संपन्न हुआ।