स्कूलों में कोयले से जल रहा चूल्हा, धुएं के बीच पक रहा एमडीएम क्योंकि, एलपीजी का फंड धनबाद पहुंचते-पहुंचते लग गए 11 माह
पहले यह आदेश पढि़ए... उज्ज्वला योजना के तहत सभी स्कूलों को एलपीजी मिलेगा। मई 2017 से सभी स्कूलों में एलपीजी पर मीड डे मील बनेगा। अब इस आदेश की हकीकत जानिए... माता समिति हर दिन लकड़ी, कोयला और गोइठा जुटाती हैं। फिर इस जलावन को जलाने का प्रयास करती है। कभी माचिस जलाती हैं तो कभी फूंक मारती हैं। स्कूल का रसोई धुएं से भर जाता है। धुआं रसोई से निकल कर बच्चों की कक्षाओं तक पहुंचती है। पूरे स्कूल में धुंआ-धुंआ नजर आता है। कोई धुएं से होने वाली आंखों की जलन से परेशान दिखता है तो कोई धुएं से सांस लेने में असहज महसूस करता है। आदेश और हकीकत के बीच आसमान और जमीन का अंतर है। यह अंतर क्यों है...? इस सवाल का जवाब जब भास्कर ने ढूंढ़ा। पेश है, इस पर यह रिपोर्ट।
जानिए, क्यों कौन है, स्कूलों में धुएं का जिम्मेवार
11 माह तक नहीं भेजा एलपीजी फंड
झारखंड राज्य मध्याह्न भोजन प्राधिकरण : स्कूलों में एलपीजी पर मीड डे मील बनाने का आदेश मई 2017 में ही हो गया, पर एलपीजी का फंड झारखंड राज्य मध्याह्न भोजन प्राधिकरण द्वारा 28 मार्च 2018 तक आवंटित ही नहीं हुआ था। फंड नहीं आने से करीब 11 माह तक आदेश के कागज पर ही पड़ा रहा।
डीएसई कार्यालय : 29 मार्च 2018 को एलपीजी का फंड डीएसई कार्यालय पहुंचा और यहां के ठंडे बस्ते में चला गया। 16 दिनों में डीएसई कार्यालय ने एक भी स्कूल को फंड आवंटित नहीं किया। डीएसई कार्यालय अभी स्कूलों को पत्राचार कर एलपीजी की खपत से संबंधित रिपोर्ट मांग रहा है।
जिम्मेवार नंबर 1
लुदी कुमारी
जिम्मेवार नंबर 2
विनीत कुमार
जब प्लान बना था तब तक पैसा नहीं आया था। प्रक्रिया पूरी करने में समय लग गया। पैसा जैसे ही आया हमें रिलीज कर दिया।
पैसा आ गया है। जिले के सभी स्कूलों से रिपोर्ट मांगी गई है। छात्रों की संख्या के हिसाब से सिलेंडर भेजा जाएगा।
प्राधिकरण ने आदेश में कहा था : हेल्थ और पर्यावरण के लिए एलपीजी जरूरी
क्या कहते हैं डॉक्टर और पर्यावरणविद
मध्याह्न भोजन के लिए चूल्हा जलाती रसोईया।
कोयले के धुएं का डस्ट पार्टिकल्स आंखों में आ सकता है। धुएं में कार्बन मोनो-ऑक्साइड जैसी गैस भी होती है। इससे आखों में जलन व लालिमा की समस्या हो सकती है। गैस अधिक खतरनाक हो और मात्रा अधिक हो तो वो आंखों को खराब भी कर सकी है।
- डॉ रजनीकांत सिन्हा, नेत्र रोग विशेषज्ञ
प्राधिकरण ने अपने दिशा-निर्देश में स्पष्ट किया था कि एलपीजी आधारित रसोई की व्यवस्था रसोइया व बच्चों के हेल्थ के लिए जरूरी है। एलपीजी पर खाना बनाने से पर्यावरण की सुरक्षा होगी। एलपीजी आधारित रसोई सभी मौसम के लिए अनुकूल भी है।
बच्चों की संख्या के आधार पर मिलना है सिलेंडर
सिलेंडर, चूल्हा, रेगुलेटर और पाइप की खरीदारी छात्र संख्या के अनुसार होनी है। मसलन 1-50 बच्चों पर दो सिलेंडर और एक चूल्हा, 51-200 बच्चों पर तीन सिलेंडर और दो चूल्हे, 201-500 बच्चों पर चार सिलेंडर और दो चूल्हे और 500 से अधिक बच्चों पर पांच सिलेंडर और दो चूल्हे दिए जाएंगे। इसके लिए करीब 1.72 करोड़ रुपए मिला है।
कोयले के धुएं से ग्रीन हाउस गैसेस निकलती हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड, कार्बन मोनो-ऑक्साइड, सल्फर डाई-ऑक्साइड जैसी खतरनाक गैस निकलती है। यह पर्यावरण को बहुत नुकसान पहुंचाती है और क्लाइमेट चेंज में इसकी भी बड़ी भूमिका होती है। - डॉ. गुरदीप सिंह, आईआईटी आईएसएम, धनबाद