सॉफ्टवेयर फेल, नामांतरण और रजिस्ट्री साथ करना मुश्किल
नए सिस्टम में संपत्ति की रजिस्ट्री होने के साथ ही उसकी सूचना राजस्व प्रकरणों की मॉनिटरिंग के लिए बने आरसीएमएस सॉफ्टवेयर पर चली जाएगी और नामांतरण रजिस्टर हो जाएगा। 15 दिन की प्रक्रिया पूर्ण होने के बाद नामांतरण आदेश जारी होगा। नए मालिक का नाम वेब जीआईएस सॉफ्टवेयर के लैंड रिकॉर्ड में दर्ज किया जाएगा।
रजिस्ट्री के सॉफ्टवेयर ई संपदा से लिंक होना है वेब जीआईएस के लैंड रिकॉर्ड का डाटा
भास्कर संवाददात| इंदौर
किसी संपत्ति की रजिस्ट्री होने के साथ ही राजस्व रिकॉर्ड में नामांतरण की मांग पुरानी है। संपत्ति के मामले में आम लोगों की परेशानी और तहसील कार्यालयों में भ्रष्टाचार की वजह इसी नामांतरण को माना जाता है। भोपाल की बैरसिया तहसील में पिछले माह शुरू हुए पायलट प्रोजेक्ट के बाद सरकार इसे मई अंत से पूरे प्रदेश में लागू करने का दावा कर रही है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है। जिस वेब जीआईएस सॉफ्टवेयर के जरिए लैंड रिकॉर्ड का डाटा रखा जा रहा है, उसमें खामियों के चलते 40 से ज्यादा जिलों के कलेक्टर उसका उपयोग ही नहीं करते। फिलहाल सिर्फ इंदौर, भोपाल, जबलपुर और शिवपुरी में ही इसका उपयोग हो रहा है। सबसे बड़ी मुश्किल तो यही है कि नामांतरण के लिए इस सॉफ्टवेयर के आधे-अधूरे और गलत डाटा को रजिस्ट्री के सॉफ्टवेयर ई संपदा के साथ कैसे लिंक किया जाएगा।
प्रदेश में राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज जमीनों का रिकॉर्ड पहले एनआईसी के सॉफ्टवेयर के जरिए रखा जाता था। बाद में यह जिम्मा निजी कंपनी को दे दिया। इसका बनाया सॉफ्टवेयर वेब जीआईएस शुरू से ही विवादों में रहा है। खसरे की नकल देने में दिक्कत, जमीन रिकॉर्ड में हेरफेर तथा गड़बड़ियों के चलते एक-एक करके कई जिलों ने इस सॉफ्टवेयर का उपयोग बंद कर दिया। हालांकि कमिश्नर लैंड रिकॉर्ड ने सभी 51 जिलों में एनआईसी के सॉफ्टवेयर का उपयोग बंद कर वेब जीआईएस सॉफ्टवेयर का उपयोग फिर से शुरू करने को कहा है।
2014 में शुरू होने वाली योजना अभी सिर्फ एक तहसील में
करोड़ों रुपए खर्च कर बनाए वेब जीआईएस सॉफ्टवेयर में लैंड रिकॉर्ड डाटा डिजिटल फॉर्म में रखा जाना था। तभी यह दावा किया गया था कि दूसरे राज्यों की तरह प्रदेश में भी रजिस्ट्री होने के साथ अपने आप नामांतरण की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। नामांतरण के लिए अलग से भटकने और आवेदन देने की जरूरत नहीं होगी और लैंड रिकॉर्ड में संपत्ति के नए मालिक का नाम भी दर्ज कर दिया जाएगा, लेकिन जो काम 2014 से शुरू होना था, वह 30 मई 2018 में शुरू करने का दावा किया जा रहा है। वह भी तब होगा, जब बैरसिया का पायलट प्रोजेक्ट सफल होगा।
संपत्ति रजिस्टर्ड होते ही चली जाएगी सॉफ्टवेयर में
पंजीयक के रिकॉर्ड में एक लाख, राजस्व रिकॉर्ड में 56 हजार गांव
ई संपदा सॉफ्टवेयर के साथ लैंड रिकॉर्ड को लिंक करने में परेशानी यह है कि दोनों के पास दर्ज गांव की संख्या अलग-अलग है। ई संपदा सॉफ्टवेयर में जहां लगभग एक लाख राजस्व इकाई दर्ज हैं, वही वेब जीआईएस सॉफ्टवेयर में 56000 राजस्व ग्राम दर्ज हैं। ऐसी स्थिति में लैंड रिकॉर्ड अपडेट करने में तो दिक्कत आनी ही है। किसी भी संपत्ति की रजिस्ट्री के बाद नामांतरण प्रकरण किस तहसीलदार के पास भेजा जाना है, यह निर्धारण करने में भी मुश्किल होगी।
सहमति और रिपोर्ट में देरी से अटक जाते थे प्रकरण
अभी तक अविवादित नामांतरण का अधिकार ग्राम पंचायतों के पास था। अन्य नामांतरण में तहसीलदार को आवेदन करने के बाद 15 दिन की समयसीमा के साथ सार्वजनिक सूचना जारी की जाती थी। फिर पटवारी द्वारा दावे-आपत्ति बुलाए जाते। नामांतरण में सहमति देने से मना करने, रिपोर्ट में देरी या गड़बड़ी के चलते मामला अटक जाता था।
सीधी बात
अगले महीने से सभी िजले इस सॉफ्टवेयर पर करेंगे काम
 जिस सॉफ्टवेयर पर नामांतरण अपडेट होना है, वही सही काम नहीं कर रहा?
-यह सही है कि अभी इंदौर सहित सिर्फ 4 जिलों में ही वेब जीआईएस पर पूरा काम हो रहा है, लेकिन अगले महीने से सब जिले इस पर काम करेंगे।
 राजस्व रिकॉर्ड और ई-रजिस्ट्री के सॉफ्टवेयर में राजस्व ग्रामों की संख्या में भी तो अंतर है।
-हां, करीब 40 हजार इकाई का अंतर है। दोनों रिकॉर्ड की मैपिंग का काम चालू है।
 तहसील का पायलट प्रोजेक्ट पर्याप्त है?
-वेब जीआईएस से डाटा नहीं मिलने के चलते प्रोजेक्ट लेट हुआ है। बैरसिया तहसील में 103 से ज्यादा प्रकरणों में रजिस्ट्री के साथ नामांतरण का प्रयोग सफल रहा है।
 प्रोजेक्ट के लिए जरूरी भू राजस्व संहिता के नामांतरण नियमों में संशोधन नहीं हुआ है।
-नामांतरण नियमों में संशोधन की जरूरत ही नहीं है। वर्तमान नियमों में भी रजिस्ट्री के साथ ही नामांतरण में कोई अड़चन नहीं आती।
-सेलवेंद्रन, कमिश्नर, लैंड रिकॉर्ड