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शिक्षित बनो, संगठित रहो, कोई जाति पूछे तो कहो मैं भारतीय हूं : राष्ट्रपति

3 वर्ष पहले
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हमें शिक्षित और संगठित होकर रहना चाहिए। जात-पात का अब वक्त नहीं है। कोई जाति पूछे तो सिर्फ यह कहना चाहिए कि मैं भारतीय हूं। डॉ. भीमराव आंबेडकर की जयंती के अवसर पर महू में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने ये बातें कही। एससी-एसटी एक्ट में बदलाव के बाद हुई हिंसा का जिक्र किए बगैर उन्होंने कहा कि हमें शांति और अहिंसा के साथ काम करना चाहिए। डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन मंत्र और भाषणों में हमेशा इसी का उल्लेख किया है। जय भीम के साथ भाषण की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि जय भीम का मतलब डॉ. आंबेडकर की जयकार से है। उनके द्वारा किए कार्यों की जयकार से है। शेष |पेज 4 पर





एक राष्ट्रपति की रूप में | मैं आप सब देशवासियों से अपील करता हूं कि आप जब भी दिल्ली आएं तो राष्ट्रपति भवन जरूर आएं। वह केवल मेरा निवास नहीं, बल्कि देश की धरोहर है। इस भवन को हर किसी व्यक्ति को देखना चाहिए। सभी के लिए राष्ट्रपति भवन खुला है।

एक विचारक के रूप में | लोग डॉ. आंबेडकर को केवल संविधान रचयिता के रूप में जानते हैं, लेकिन कम लोगों को मालूम होगा कि भारतीय रिजर्व बैंक की स्थापना में भी उनकी गहरी भूमिका रही। देश में सरकारी क्षेत्र के कई कारखानों को शुरू करने में उनका योगदान रहा। आजादी के बाद वह देश को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे। स्वदेशी उत्पादन पर भी उनका जोर था। उनका एक लेख प्रकाशित हुआ था जिसके बाद उन्हें एक अर्थशास्त्री के रूप में भी पहचान मिली।

इन किरदारों के जरिये समझिए संबोधन
एक अनुयायी| मैंने पूछा था कि क्या कोई राष्ट्रपति डॉ. आंबेडकर की जन्मस्थली पर गया? मुझे बताया कि आप पहले राष्ट्रपति होंगे। स्मारक पर मत्था टेका तो सुकून मिला। डॉ. आंबेडकर की विचारधारा सभी वर्गों के लिए है। संविधान भी उन्होंने सभी के लिए बनाया।

एक शिक्षक|डॉ. आंबेडकर का जोर हमेशा शिक्षित होने पर रहा है। शिक्षा का मतलब केवल किताबी ज्ञान नहीं। हम जो पढ़ रहे हैं, समझ रहे हैं उसके मायने क्या हैं? शिक्षा से हमारे जीवन में बदलाव क्या आए? संविधान में भी उन्होंने शिक्षा पर जोर दिया है।

डॉ. आंबेडकर जब पहली दफा लोकसभा गए थे तो वह वहां मौजूद सांसदों में सबसे ज्यादा शिक्षित थे। उनके पास जितनी डिग्री थी, उतनी किसी के पास नहीं थी।

एक अभिभावक| युवाओं से अपील है कि वह शांति और अहिंसा के रास्ते पर चलें। किसी मामले में आपत्ति होने पर संविधान में अपनी बात और आपत्ति दर्ज कराने के रास्ते दिए गए हैं। हमें अराजक होकर काम नहीं करना चाहिए।

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