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मोदी और केजरीवाल पर अपमानजनक शब्दों वाली डाॅक्यूमेंट्री सेंसर से पास

3 वर्ष पहले
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पिछले लोकसभा चुनाव में बनारस सीट पर हुए चुनावी महासमर पर बनी डाक्यूमेंट्री फिल्म \\\"बैटल फॉर बनारस\\\' आखिरकार हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल से पास हो गई है। फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बारे में की गईं \\\"अपमानजनक\\\' टिप्पणियों को ट्रिब्यूनल ने यह कहते हुए पास कर दिया कि उन्हें देश के दर्शकों के तजुर्बे और विवेक पर पूरा भरोसा है।

फिल्म बनने की शुरुआत अप्रैल 2014 में हुई थी और अगस्त 2015 में यह बनकर तैयार हो गई। 44 दिनों तक बनारस के चुनाव अभियान के भाषणों और प्रचार को रेकॉर्ड किया गया। फिर \\\"बैटल फॉर बनारस\\\' लंबी लड़ाई से गुजरी। सेंसर बोर्ड ने अक्टूबर 2015 में इसे खारिज कर दिया। बोर्ड का कहना था कि उम्मीदवार चुनाव के दौरान ऐसी-ऐसी बातें कहते हैं जो बेहद आपत्तिजनक होती हैं। सेंसर बोर्ड के फैसले को फिल्म सर्टिफिकेशन अपीलेट ट्रिब्यूनल ने भी जायज ठहराया था। लेकिन जनवरी 2018 में दिल्ली हाई कोर्ट ने बोर्ड के तर्कों को नहीं माना और अपीली ट्रिब्यूनल से फिल्म पर नए सिरे से गौर करने का निर्देश दिया। अब न्यायाधिकरण के सामने डाक्यूमेंट्री को खारिज करने का कोई रास्ता नहीं रह गया था। आखिरकार उसने फिल्म को यूए सर्टिफिकेट से पास कर दिया।

दरअसल सेंसर बोर्ड को फिल्म में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और आप नेता अरविंद केजरीवाल पर किए गए कुछ कमेंट पर आपत्ति थी। इसी बारे में जस्टिस मनमोहन सरीन की अध्यक्षता में ट्रिब्यूनल ने सफाई मांगी। डॉक्यूमेंट्री के एक दृश्य में एक किन्नर मोदी के बारे में कह रहा है - \\\"मोदी जहाज से आया, क्या करके चला गया? भीड़ बटोर के लेकर आया, क्या किया? कुछ नहीं किया...\\\'। फिल्म के डायरेक्टर अपीलकर्ता कमल स्वरूप के वकील ने ट्रिब्यूनल को इस पर कहा कि किन्नर की बात को डॉक्यूमेंट्री में जस का तस इस्तेमाल किया गया। बिना कोई अपनी राय जोड़े रीप्रोड्यूस किया गया है। अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ा है। शेष | पेज 4 पर

ट्रिब्यूनल ने केजरीवाल के बारे में किए गए कमेंट्स के बारे में भी पूछा। फिल्म में किन्नर एक रिपोर्टर से बातचीत में कहता है- \\\"अरविंद केजरीवाल हैं, तो वह आम आदमी की टोपी लगाकर घूम रहे हैं। वह आम आदमी हैं? दो महीने के अंदर सरकार की कितनी बढ़िया कुर्सी दिल्ली से मिली थी, बेचकर भाग आया। तो बनारस से जीत के कहां जाएंगे? सेंसर बोर्ड ने \\\"कुर्सी बेचकर भाग आया\\\' वाक्य को अपमानजनक बताया था। इस पर अपीलकर्ता ने दलील दी कि ये बात तो वाकई कही गई थी और वास्तविक बयान पर आधारित है।

ट्रिब्यूनल ने फिल्म को पास करते हुए इसमें एक इंट्रोडक्शन और एक डिसक्लेमर जोड़ने की हिदायत दी। अलबत्ता मोदी और केजरीवाल के बारे में किए गए कमेंट्स को नहीं हटाया। डिसक्लेमर में कहा जाएगा कि फिल्म में कुछ बातें राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं को रास नहीं आएंगी और हो सकता है कि वे इन्हें अपमानजनक भी माने, लेकिन ये बातें रेकॉर्ड में हैं और वास्तव में कही गई हैं, जिन्हें डाक्यूमेंट्री में सिर्फ जस का तस रख दिया गया है।

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