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लहसुन का स्टॉक बोझ हलका करने के लिए राज्य निर्यातकों को सब्सिडी दें

3 वर्ष पहले
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मप्र सरकार ने लहसुन के भावांतर योजना में एक बार फिर से बदलाव किया है। अब सभी लहसुन उत्पादक किसानों को उनकी लहसुन चाहे जिस भाव पर बिके 800 रुपए क्विंटल के भाव से सब्सिडी दी जाएगी। अभी तक 1600 रुपए से नीचे लहसुन बिकने पर किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं देने का नियम था। मंडियों में 80 प्रतिशत लहसुन 1600 रुपए के भाव से नीचे बिक रही थी, जिससे किसानों में असंतोष व्याप्त था। राजस्थान सरकार किसानों से 1.54 लाख टन लहसुन की खरीदी करेगी। 25 एमएम से अधिक मोटाई वाली लहसुन 3257 रुपए प्रति मीट्रिक टन खरीदेगी। खरीदी का आधाभार केंद्र एवं आधा राज्य सरकार उठाएगी। केंद्र एवं राज्य सरकारों ने सब्सिडी देकर निर्यात करने के प्रयास नहीं किए तो इस बार आलू, टमाटर के समान लहसुन भी फैंकना पड़ सकती है। हाल ही में आलू के भावों में आई तेजी का लाभ किसानों को उठाना चाहिए। कुछ सटोरियों ने कम फसल के नाम पर तेजी कर दी है। शायद अधिक दिन टिकने वाली नहीं है। भावों में तेजी की वजह से निर्यात भी रुक गया।

आवक अधिक, मांग कम

एक अनुमान के अनुसार मप्र में 1 से 1.25 लाख बोरी, राजस्थान में 65 से 75 हजार उत्तरप्रदेश में 15 से 20 हजार गुजरात में 10 से 15 हजार बोरी की आवक हो रही है। कुल आवक 1.90 से 2.50 लाख बोरी के बीच हो रही है। खपत केवल 1 से 1.25 लाख बोरी की है। प्रतिदिन 1 से 1.25 लाख बोरी शेष रह जाती है, ऐसे में तेजी तो कभी भी नहीं आ सकेगी। वर्तमान स्थिति में सुधार नहीं आया तो सीजन के अंत में आलू, टमाटर, प्याज के समान लहसुन को भी फेंकना पड़े तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। भावांतर योजना का लाभ पिछले सीजन में सभी को मिला था, इस बार नियमों में परिवर्तन की वजह से सभी किसानों को शायद नहीं मिल रहा है। भावांतर योजना की कमी यह है कि बाजारों में भाव नहीं बढ़ते हैं। पूरे वर्ष कम भाव पर जिस बिकती रहती है। किसान भी भावांतर का लाभ लेने के लिए चाहे जिस भाव पर जिंस बेचकर चले जाते हैं। इस योजना के लाभ यदि अनेक है तो दोष भी कम नहीं है। सरकारी अधिकारी वर्ग बिना ठोस होमवर्क किए योजना को लागू कर देते हैं, जितना परिणाम अंतत: किसानों को ही उठाना पड़ता है।

योजना का पूरा लाभ नहीं

जानकारों के अनुसार लहसुन उत्पादक किसानों को भावांतर योजना का पूरी तरह से लाभ नहीं मिल रहा है। इस वर्ष फसल अधिक है। बाजारों में धन की तंगी, आने वाले महीनों में लहसुन के भाव बढ़ने वाले नहीं है। अत: स्टॉकिस्टों खरीदी से बाहर हैं। इसके अलावा गुजरात की फैक्टरियों की खरीदी अभी तक शुरू नहीं हो सकी है और शायद निर्यात भी ठंडा है। इस वजह से अच्छी क्वालिटी की लहसुन भी 16 रुपए किलो से अंदर बिक रही है। उल्लेखनीय है कि उत्पादन में मप्र की भागीदारी 50 प्रतिशत है, तो 30 प्रतिशत राजस्थान, 10 प्रतिशत उप्र एवं 10 प्रतिशत गुजरात की है। अनेक किसानों ने रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया है। कुछ किसान इंदौर में आढ़तियों के माध्यम से बेच रहे है।

बोवनी 10 से 15% कम

जानकार क्षेत्रों का मत है कि इस बार देश के कुछ राज्यों में आलू की बोवनी 10 से 15 प्रतिशत कम हुई होगी, चिप्स का आलू बड़ी मात्रा में स्टॉक में चला गया है। तेजी की आशा से किसानों ने स्वयं बड़ी मात्रा में आलू का स्टॉक किया है। हालांकि गुजरात में उत्पादन अधिक हुआ है। किंतु वहां के व्यापारियों ने सट्‌टारूपी कामकाज शुरू कर दिया था, जिससे 12 से 15 रुपए किलो बिकने वाले चिप्स के आलू को 20 से 22 रुपए बिकवा दिया। ऐसी आशंका है कि अगले कुछ दिन सट्‌टेबाजी और चल सकती है। सट्‌टेवालों को किसी प्रकार का खौफ भी नहीं है। सर्वाधिक उल्लेखनीय है कि यह एक चिप्स बनाने वाली कंपनी ने ज्योति आलू से चिप्स बना ली है। इस वजह से ज्योति आलू काफी ऊंचे भावों पर बिक रहा है। पड़तल नहीं लगने से निर्यात नहीं हो सका। सट्टेबाजी का एक अन्य प्रभाव यह भी पड़ा कि भारतीय बाजारों में भाव ऊंचे होने से निर्यात ठंडा पड़ गया। यदि आलू का निर्यात पर्याप्त मात्रा में नहीं हुआ तो इसका सीधा प्रभाव सीजन के अंत में फिर से देखने को मिलेगा।

29 नए शीतगृह बने

यह भी उल्लेखनीय है कि मप्र में कुल 29 नए शीतगृह बने हैं, जिसमें से 19 शीतगृह इंदौर जिले में ही बने हैं। सभी शीतगृहों में 50-50 हजार कट्टे की आलू के रखे गए होंगे तब करीब 14 लाख कट्टों का अतिरिक्त स्टॉक हो गया है। राशन के आलू में मांग सामान्य है। भाव आंशिक घट-बढ़ के बीच चलते रहेंगे। एक अन्य विशेषज्ञ के अनुसार आलू की बोवनी कुछ मात्रा में कम होने के साथ किसानों द्वारा शीतगृहों में तेजी गति से स्टॉक करने से सेंटी मेंट एकदम बदल गया और भावों में तेजी आ गई। इसके अलावा शीतगृहों में आलू चाहे सीधे चला गया हो किंतु मंडियों में बिकने जो माल आ रहा है, उनकी संख्या काफी कम है। आलू हाथों हाथ बिकता रहा। इंदौर- उज्जैन के शीतगृह अभी तक 80 प्रतिशत ही भरे गए हैं। इस वजह से भी तेजी का रुख बन गया है। उप्र, बिहार, बंगाल, पंजाब, गुजरात में भी उत्पादन 10 से 20 प्रतिशत कम हो सकता है।

चुकंदर-गाजर का स्टॉक

पिछले कुछ वर्षों से शीतगृहों में बड़ी मात्रा में चुकंदर और गाजर का भंडारण भी होने लगा है। इस बार चुकंदर सस्ता होने से बड़ी मात्रा में स्टॉक में गया है। इन दोनों का स्टॉक पिछले वर्ष से 20 प्रतिशत अधिक हुआ है। ब्याह-शादियों के सीजन और अन्य समारोह की मांग के लिए थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बिक्री हेतु बाजार में आते रहेंगे।

लहसुन का उपयोग एक सीमा से अधिक नहीं
बताया जाता है कि नोटबंदी एवं जीएसटी लागू होने के बाद मसालों की खपत में भी गिरावट आई है। इसका सीधा प्रभाव लहसुन उत्पादकों पर भी पड़ा है। पिछले वर्षों में गुजरात की फैक्टरियां 30 रुपए किलो में लहसुन खरीदी करती थी, वर्तमान में 5 रुपए किलो में भी खरीदी नहीं कर रही है। लहसुन एक ऐसी जिंस है, जिसका उपयोग एक सीमा से अधिक नहीं हो सकता है। उत्पादन में वृद्धि सीमित उपयोग और निर्यात में कमी से भावों में आशा से विपरीत गिरावट आ गई है। बताया जाता है कि वर्ष 2008 में लहसुन सीजन के अंत में एक रुपए किलो बिक गई थी, इस वर्ष इन भावों पर भी बिक जाए तो किसान किस्मत वाले समझे जाएंगे। कुछ अनुभवी व्यापारियों का मत है कि मप्र सरकार भावांतर योजना के बजाय निर्यात करने वाले व्यापारियों को जानकारी निकालकर सब्सिडी दे दें तब भी लाभ किसानों को मिलने वाला है। निर्यातक ऊंचे भावों पर लहसुन खरीद कर सकते हैं। लहसुन के भावों की मंदी केवल निर्यात बढ़ाने से रुक सकती है, जिस पर केंद्र राज्य सरकारें अभी तक मौन है।

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