कुछ लोगों को पता होता है कि वे क्यों जन्मे हैं
स्टोरी 1 : हाल ही में मैं मध्यप्रदेश के छतरपुर जिले के बिजावर स्थित ‘जटाशंकर’ मंदिर में गया। दूर से देखकर कभी पता नहीं चलता कि मंदिर में भीड़ है या नहीं, क्योंकि मंदिर पहाड़ी के मध्य में है। पहाड़ी तक ड्राइव करने और फिर भगवान शिव के दर्शन करने के लिए पहाड़ी के बीच तक पैदल जाने की सुविधा है। गर्भगृह इतना छोटा है कि एक वक्त में तीन से ज्यादा लोग निकट से दर्शन नहीं कर सकते। इसलिए दर्शन में बहुत ज्यादा समय लग जाता है। लेकिन, जब मेरे ड्राइवर ने मंदिर में किसी को मेरा परिचय दिया कि मैं डॉ. राधेश्याम भटनागर का मेहमान हूं तो पूरा परिदृश्य ही बदल गया। समिति ने मेरे दर्शन के लिए विशेष राह निकाली और पूरे साल भरे रहने वाले पानी के तीन स्रोतों से पवित्र जल मेरे स्नान के लिए लाया गया और किसी सुपर वीवीआईपी की तरह मुझे दर्शन लाभ मिला। बाद में एक दल मुझे मेरी कार तक छोड़ने आया। इससे मैं सोचने पर मजबूर हुआ कि एक डॉक्टर का किसी मंदिर से क्या संबंध हो सकता है?
डॉ. भटनागर बीएचएमएस फार्मेसी डिप्लोमा धारी हैं और सौभाग्य से फार्मासिस्ट के रूप में 1964 में उनकी नियुक्ति उनके ही शहर बिजावर में हुई। बाद में उनका तबादला जिला मुख्यालय छतरपुर में हो गया, जो उनके शहर से 25 किलोमीटर से ज्यादा दूर नहीं है। चूंकि सड़कें न के बराबर थीं तो सफर में बहुत वक्त लगता था। इसलिए वे जिला मुख्यालय में रहे और वहां तीन साल सेवा दी। किंतु जब वे सप्ताहांत में जाते तो उन्हें अच्छे डॉक्टरों व दवाइयों के अभाव में ग्रामीणों के कष्टों की खौंफनाक कहानियां सुनने को मिलती। फिर उनकी माताजी सुंदर बाई ने उन्हें नौकरी छोड़कर उस गांव की सेवा करने पर मजबूर किया, जहां वे पले-बढ़ें। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अब 75 वर्ष के हो चुके डॉक्टर रोज 18 घंटे काम करते हैं और वे हर उस व्यक्ति के लिए मसीहा हैं, जो बीमार पड़ता है। कोई अचरज नहीं कि जब मैं मंदिर जाने के पहले उनके घर ठहरा तो देखा कि एक बड़ी भीड़ अपने देवता का इंतजार कर रही है!
स्टोरी 2 : यदि आप सोचते हैं कि डॉ. भटनागर जैसे अत्यधिक जुनूनी व्यक्ति इस आधुनिक पीढ़ी में अब नहीं हैं तो आपको 35 वर्षीय डॉ. पी. आदर्श से मिलना चाहिए। चेन्नई के जयेन्द्र सरस्वती आयुर्वेद कॉलेज एंड हॉस्पिटल से बीएएमएस की डिग्री लेने वाले आदर्श हमेशा से आदिवासी इलाकों के लोगों की सेवा करना चाहते थे। यह तड़प उन्हें केरल के मुन्नार स्थित मनकुलम पंचायत के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ले गई। यह ऐसे घने जंगल के बीच है कि लोग उस स्वास्थ्य रक्षा केंद्र पर बहुत कम जाते हैं। सुविधाओं के अभाव के कारण कई डॉक्टर वह जगह छोड़कर चले गए। वर्तमान में पिछले कुछ साल से डॉ. आदर्श एक ही पैरामेडिकल स्टाफ कृष्णन के साथ काम करते हैं और 100 छोटे गांवों तक सेवा देते हैं सिर्फ एक ही संकल्प के साथ कि कोई भी 24 घंटे में कभी भी उनका दरवाजा खटखटा सकता है और वे उसका उपचार करेंगे बिना एक पैसा लिए।
इस रवैए और भरोसे के कारण रोगी 50 किमी चलकर उनके संेटर तक पहुंचते हैं, क्योंकि वे उन्हें ईश्वर का भेजा हुअा दूत मानते हैं। कभी-कभी वे जीप किराये पर लेकर आदिवासी इलाकों के अत्यंत भीतर की जगह पर भी जाते हैं। मानसून में तो किसी खास जगह पर जाने के लिए उन्हें छह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता है। उनके समर्पण का नतीजा न सिर्फ डोनेशन में मिले 4 लाख रुपए बल्कि खून की कमी, त्वचा रोग और अन्य संक्रामक रोगों के प्रति जागरूकता के रूप में सामने आया है। सरकार भी विशेष रुचि लेकर इस केंद्र को एक मिसाल बनाना चाहती है।
फंडा यह है कि  हर युग में ऐसे लोग होते हैं, जिन्हें जीवन में अपना उद्देश्य पता होता है और वे उसी के लिए काम करते हैं।
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एन. रघुरामन
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