करंट अफेयर्स पर 30 से कम उम्र के युवाओं की सोच
कृष्ण जांगिड़, 22
राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर
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कर्नाटक विधानसभा के चुनावी नतीज़ों में आए खंडित जनादेश के बाद सरकार गठन को लेकर राज्यपाल की ज़िम्मेदारी काफी महत्वपूर्ण थी। ऐसे में अनुच्छेद 164 के तहत अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए राज्यपाल ने सबसे बड़े दल भाजपा के नेता येद्दियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट ने गंभीरता दर्शातें येदियुरप्पा के नेतृत्व में कर्नाटक की नवगठित भाजपा सरकार को अगले ही दिन तक बहुमत साबित करने के निर्देश दिए। जैसा कि अंदेशा जताया जा रहा था, भाजपा बहुमत सिद्ध करने में असफल रही। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर राज्यपाल की विवेकशक्ति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया।
गौरतलब है कि एसआर बोम्मई केस, रामेश्वर प्रसाद केस, गत वर्ष गोवा सरकार के गठन जैसे अनेक मामले समय-समय पर राज्यपाल को महज़ केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के तौर पर ही परिभाषित करते आए हैं। इन वाकयों से यह स्पष्ट हो जाता है कि राजनीतिक अस्थिरता और गठबंधन सियासत के दौर में राज्यपाल को महज शोभा का पद अथवा वैधानिक प्रधान नहीं माना जा सकता। संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या करने और सरकार गठन में राज्यपाल की भूमिका अति-महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। उल्लेखनीय है कि 1983 में गठित सरकारिया आयोग की रिपोर्ट में संघ-राज्यों के संबंधों की बेहतरी व राज्यों के संवैधानिक प्रधान की छवि को निष्पक्ष, जवाबदेह और ज़िम्मेदार बनाने संबंधी सिफारिशें की गई है। आयोग ने राज्यपाल की नियुक्ति के लिए राजनीतिक प्रभाव से दूर सामाजिक क्षेत्रों के विशिष्ट व्यक्ति के चयन की सिफारिश की। साथ ही इस नियुक्ति के लिए संबंधित राज्य के मुख्यमंत्री, राज्यसभा सभापति व लोकसभा अध्यक्ष से बने पैनल के गठन की बात कही। लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने इन सिफारिशों पर अमल नहीं किया। आज भी केंद्र में सत्ता परिवर्तन होने पर सरकार समर्थित विचारधारा के व्यक्तियों को विभिन्न राज्यों में राज्यपाल पद पर नियुक्त किया जाता है। महज़ दलीय स्वार्थ सिद्धि को लेकर राज्यपाल जैसी संवैधानिक संस्था का क्षरण दु:खद है।