महाराष्ट्र में खरीदी बंद होने के बाद चना, तुअर की आवक का दबाव बढ़ गया। मंडियों से लेवाल गायब होते नजर आ रहे हैं। किसानों की मुसीबत यह है कि खरीफ फसलों के लिए खेतों की तैयारी के लिए नकद रुपया चाहिए। दालों का निर्यात नहीं बढ़ना शुरू संकेत नहीं है। विदेशों में दालें काफी सस्ती है। ऐसी स्थिति में 2022 तक कृषि निर्यात कैसे दोगुना होगा। समर्थन मूल्य बढ़ाना से अनेक समस्याएं पैदा हो रही हैं। इस परंपरा को जितनी जल्दी हो ब्रेक लगा देना चाहिए। बैंकों ने दलहन-दाल मिलों को नई वित्तीय सेवाएं देना बंद कर दिया है। यह जोखिम वाला झोन हो गया है। दलहन-दाल बाजारों में देशभर में आए दिन पार्टियां हाथ ऊंचे करने लगी है। यह घोर आर्थिक संकट का घोतक कहा जा सकता है।
मप्र में उड़द का भरावा
महाराष्ट्र में चना-तुअर की खरीदी बंद होने के बाद लातूर एवं राज्य की अन्य मंडियों आवक बढ़ गई हैं। लेवाल दूर तक नजर नहीं आ रहे हैं। किसानों को खरीफ फसलों के लिए खेतों को तैयार करना है। बीज, खाद की व्यवस्था करना है। खेतों में काम करने वाले मजदूरों को नकद भुगतान देना है। किसानों के पास नकदी की कमी पड़ गई है। बेचवाली बढ़ने से दलहनों में मंदी और अधिक गहराती जा रही है। उड़द का भरावा मप्र में अधिक है। हलका उड़द जलगांव डिलीवरी 2500 रुपए में बेचवाल है, जबकि लेवाल 2100 रुपए के बताए जा रहे हैं। उड़द आयात की अनुमति अलग से दे दी है। कुछ बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पिछले महीने में जब उड़द सस्ता हो गया था, स्टॉक करके रख लिया था। अब स्टॉक का उड़द भारतीय बाजारों में आकर और खराबी करेगा।
दालों का निर्यात संभव नहीं
एक दशक से अधिक समय से लगे दालों पर लगा प्रतिबंध हटाने के बाद भी निर्यात में उल्लेखनीय सफलता नहीं मिली है, जो कृषिगत निर्यात नीति के हाल ही में जारी मसौदे के लिहाज से शुभ संकेत नहीं है। कृषि गत निर्यात नीति का उद्देश्य वर्ष 2022 तक भारत में कृषि निर्यात दोगुना करना है। भारत में दलहनों का समर्थन मूल्य प्रतिवर्ष बढ़ता जा रहा है, जिससे दालें महंगी होना स्वाभाविक है। भारत में आयात बंद किया और कुछ पर आयात शुल्क लगा दिया, जिससे विदेशी बाजारों में भाव बड़ी मात्रा में घट गए। वर्तमान स्थिति में तो दालों का निर्यात किसी भी हालत में संभव नहीं है। खाड़ी देशों, यूरोप और अमेरिका में रहने वाले भारतीय ही दालों का नियमित उपयोग करते हैं, लेकिन उन्हें अन्य देशों से सस्ती दालें मिल रही हैं। ऐसे में भारत की महंगी दालें खरीदना कौन पसंद करेगा?
बाजारों की स्थिति
दलहन-दाल बाजार का व्यापार करने वालों की आर्थिक स्थिति में अकल्पनीय बिगाड़ आ गया है। ऐसा आभास हो रहा है कि नोटबंदी का प्रभाव बाजारों पर अब देखने को मिल रहा है। जलंगाव की मिलों से पिछले 4 माह मुंबई, पूना, हैदराबाद, बैंगलुरू, राजस्थान गई दाल-मोगर का रुपया आना बंद हो गया है। यह रुपया 7 से 9 करोड़ के बीच बताया जा रहा है। अकोला में भी हालात ठीक नहीं है। सर्वाधिक हालत दिल्ली के बड़े आयातकों और आढ़तियों की खराब है। 6000 से 7000 रुपए कीमत के रखे उड़द का क्या करना यह सूझ-समझ नहीं पड़ रही है। इन्हीं आढ़तियों ने कमाई के समय महंगी जमीने खरीद ली अब उनकी कीमत 30-40 प्रतिशत रह गई है अर्थात् एक तरफ आढ़त में रखे माल में घाटा हो गया और दूसरी और जमीन के भाव पानी-पानी हो गए। इस वजह से दिल्ली में 100 करोड़ से लेकर 1000 करोड़ के फटाके फूटते सुने जा रहे हैं, इस वजह से कई दशकों से बड़ा व्यापार दिल्ली से चलता था। वह विश्वास डगमगाने लगा है। चाहे जो माल लोकल बाजारों में नहीं बिकता हो, उसे दिल्ली भेज दिया करते थे। दिल्ली के आढ़तिए माल का 70 से 80 प्रतिशत भुगतान कर देते थे। बदली परिस्थितियों आढ़तिया फर्मों की पूंजी डूबना तय है, क्योंकि मंदी बड़ी मात्रा में आ गई है।
बैंकों से भी वित्तीय सहायता मिलना बंद
नोटबंदी के पूर्व व्यापारियों, दाल मिलों, आढ़तियों को नकद अथवा चेक से लाखों रुपए का फायनेंस मिल जाया करता था। नोटबंदी के बाद नकद रुपया चलन से बाहर हो गया। सरकार ने ऐसा कानून बना दिया है, जिससे नकद रुपया ब्याज पर देने वाला ही घाटे में रहेगा। यदि लेवाल की नीयत बदल गई तो नोटबंदी के बाद अच्छे-अच्छों को नीयत खराब हो गई है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है। इस वजह से भी बाजार में उधार मिलना बंद हो गया है। कुछ भुगतान करने से हाथखड़े करने लगे हैं। नई समस्या बैंकों से आ गई है। बैंकें अंदर ही अंदर अपने आप में बीमार है और वे अपनी बीमारी को उजागर भी नहीं कर पा रही है। बैंकों ने दाल मिलों, आयातक, निर्यातक और स्टॉकिस्टों ऋण सुविधा दे रखी हैं। उनमें से अनेक व्यापारी वेयर हाउसों में रखे माल छुड़वाने नहीं आ रहे हैं। इस वजह से बैंकों को इन दलहन-दाल क्षेत्र में वित्तीय सुविधा देने की बंद कर दिया है। बैंकों के लिए यह जोखिम वाला झोन हो गया है, बताया जाता है।