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न्याय पर भीड़तंत्र को हावी होने से रोकना होगा

3 वर्ष पहले
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अगले हफ्ते आज़ादी के 71 बरस पूरे होंगे और इस दौर में भी कोई यह कहे, हमें चाहिए आज़ादी या फिर कानून का राज है कि नहीं। या फिर भीड़तंत्र ही न्यायिक तंत्र हो जाए और संविधान की शपथ लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पदों में बैठी सत्ता कहे कि भीड़तंत्र की जिम्मेदारी तो अलग-अलग राज्यों में संविधान की शपथ लेकर चल रही सरकारों की है। यानी जिस आज़ादी का जिक्र आजादी के 71वें बरस में हो रहा है, क्या वह डराने वाली नहीं है? क्या एक ऐसी उन्मुक्तता को लोकतंत्र का नाम दिया जा सकता है? लोकतंत्र चुनावी सियासत की मुट्‌ठी में कुछ इस तरह कैद हो चुका है कि जिस आवाम को 71 बरस पहले आज़ादी मिली, वही आवाम अब अपने एक वोट के आसरे दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में खुद को आज़ाद मानने का जश्न मनाती है। लालकिले की प्राचीर से देश के नाम संदेश को सुनकर गदगद हो जाती।

लोकतंत्र को चुनाव के नाम पर ज़िंदा रखे चुनाव आयोग को संसद के भीतर सत्ता का गुलाम करार देने में कोई हिचकिचाहट विपक्ष को नहीं होती। चलिए सिलसिला अतीत से शुरू करें। बेहद महीन लकीर है कि आखिर क्यों लोहिया संसद में नेहरू की रईसी पर सवाल उठाते हैं? देश में असमानता या पीएम की रईसी तले पहली बार संसद के भीतर समाजवादी नारा लगाकर तीन आना बनाम सोलह आना की बहस छेड़ते हैं। क्यों दस बरस बाद वही जयप्रकाश नारायण कांग्रेस छोड़ इंदिरा गांधी के तानाशाही रवैये के खिलाफ जन आंदोलन की अगुवाई करते हुए नज़र आते हैं? क्यों उस दौर में राजनीतिक सत्ता के करप्शन को ही सांस्थानिक बना देने के खिलाफ नवयुवकों से स्कूल-कॉलेज छोड़कर जेल भर देने और सेना के जवान-सिपाहियों तक से कहने से नहीं हिचकते कि सत्ता के आदेशों को न माने?

क्यों जनता के गुस्से से निकली जनता पार्टी महज दो बरस में लड़खड़ा जाती है? क्यों आपातकाल लगाने वाली इंदिरा फिर सत्ता में लौट आती हैं? क्यों ऐतिहासिक बहुमत बोफोर्स घोटाले तले पांच बरस भी चल नहीं पाता? क्यों बोफोर्स सिर्फ सत्ता पाने का हथकंडा मान लिया जाता है? क्यों आरक्षण और राम मंदिर सत्ता पाने के ढाल के तौर पर ही काम करते हैं और क्यों 1993 में वोहरा कमेटी की रिपोर्ट देश के सामने नहीं आ पाती, जो खुले तौर पर बताती है कि कैसे सत्ता किसी माफिया की तरह काम करती है। कैसे 84 में एक भारी पेड़ गिरता है, जो जमीन हिलाने के लिए सिखों का कत्लेआम, देश इंदिरा की हत्या के सामने खारिज करता दिखाई देता है? क्यों अन्ना आंदोलन के वक्त देश के नागरिकों को लगता है कि पीएम सरीखे ऊपरी पदों पर बैठे सत्ताधारियों के करप्ट होने पर भी निगरानी के लिए लोकपाल होना चाहिए। धीरे-धीरे आज़ाद भारत के 71 बरस के सफर के बाद ये सच भी देश के भीतर बैचेनी पैदा नहीं करता कि नौ राज्यों में 27 लोगों की हत्या सिर्फ इसलिए हो जाती है कि कही गोवध न हो जाए या फिर कोई बच्चा चुरा न ले जाए। कानों की फुसफुसाहट से लेकर सोशल मीडिया के जरिये ऐसी जहरीली हवा उड़ती है कि कोई सोचता ही नहीं कि संविधान भी है, कानून भी कोई चीज है। पुलिस प्रशासन की भी कोई जिम्मेदारी है।

सीवीसी, सीएजी, चुनाव आयोग से लेकर सुप्रीम कोर्ट कोई मायने नहीं रखता। ये सवाल किसी भी आम नागरिक को डराने लगता है कि वह कितना स्वतंत्र है। न्याय की आस संविधान में लिखे शब्दों पर भारी पड़ती दिखाई देती है, तो फिर जो ताकतवर होगा उसी के अनुरूप देश चलेगा। ताकतवर होने का मतलब अगर चुनाव जीतकर सत्ता में आना होगा तो फिर सत्ता कैसे जीती जाती है, समूचा तंत्र इसी में लगा रहेगा। चुनाव जीतने या जिताने के काम को ही सबसे महत्वपूर्ण माना भी जाएगा और बना भी दिया जाएगा और जीतने वाला अपराधी हो तो भी फर्क नहीं पड़ता। हारने वाला संविधान का हवाला देते रहे तो भी फर्क नहीं पड़ता। यानी आज़ादी पर बंदिश नहीं है, पर आज़ादी की परिभाषा ही बदल दी गई।

ये सवाल मायने रखेगा ही नहीं कि आज़ादी होती क्या है? गणतंत्र होने का मतलब होता क्या? निजी तौर पर आज़ादी के मायने बदलेंगे और देश के तौर पर आज़ादी एक सवाल होगा, जिसे परिभाषित करने का अधिकार राजनीति को होगा, क्योंकि देश में एकमात्र संस्था राजनीति ही तो है। बड़ी बात ये कि देश की पहचान पीएम से होती है और राज्य की पहचान सीएम से। यानी आज़ादी का आधुनिक सुकून यही है कि 2019 के चुनाव आज़ाद सत्ता और गुलाम विपक्ष के नारे तले होंगे। फिर 2024 में यही नारे उलट जाएंगे। आज आज़ाद होने वाले तब गुलाम हो जाएंगे। आज के गुलाम तब आज़ाद हो जाएंगे। आज़ादी महज अभिव्यक्ति करना या करते हुए दिखना भर नहीं होता, बल्कि आज़ादी किसी का ज़िंदगी जीने और जीने के लिए मिलने वाली उस स्वतंत्रता का एहसास है, जहां किसी पर निर्भर होने या हक के लिए गुहार लगाने की जरूरत न पड़े। संयोग से आजादी के 71 बरस बाद सत्ता ने खुद पर हर नागरिक को निर्भर कर लिया है। कानून संभालने वाली संस्थाओं पर भीड़तंत्र का न्याय भी हावी हो सकता है। मंत्री अपराधियों को माला भी पहना सकता है और कोई मंत्री सोशल मीडिया के लुंपन ग्रुप से ट्रोल भी हो सकता है।

अगले आम चुनाव की आहट चाहे सुनाई दे रही हो लेकिन, उसमें कई उतार-चढ़ाव व मोड़ आएंगे। सत्ता पक्ष की रणनीति कई मोड़ लेगी तो विपक्षी एकता के परवान चढ़ने की दिशा में कई समीकरण बदलेंगे। लेकिन, 2019 के चुनाव में जीत-हार के परे गणतंत्र को भीड़तंत्र से बचाने को मुद्‌दा बनना होगा। नागरिकों की सत्ता पर निर्भरता कम होनी चाहिए। हर तरह के संस्थानों की स्वायत्तता कायम ही नहीं रहनी चाहिए बल्कि उसका दायरा व्यापक होना चाहिए। चुनाव जीतने या जिताना फोकस में न हो बल्कि सुशासन और कानून-व्यवस्था का राज फोकस में होना चाहिए। पक्ष अथवा विपक्ष में गठबंधन बने तो इन्हीं मुद्‌दों पर हो। 2019 सिर्फ सत्ता पलट का चुनाव नहीं हो। पारदर्शिता का हो, हकीकत को देखने-दिखाने की काबिलियत का चुनाव हो।

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

2019



पुण्य प्रसून वाजपेयी

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