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संसार के सुख मेंढक की तरह होते हैं, आते और चले जाते हैं : हितेशचंद्रविजयजी

3 वर्ष पहले
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जीवन को सार्थक बनाने के लिए गुरु का होना आवश्यक है। गुरु के कई रूप होते हैं। कोई पत्थर की भांति कठोर होते हैं जो स्वयं भी नहीं तरते व औरों को भी नहीं तारते। कुछ पत्ते की तरह होते हैं जो स्वयं को तो तरते ही है और दूसरों को नहीं तार पाते लेकिन कुछ नाव की भांति होते हैं जो स्वयं भी तरते और दूसरों को भी तार देते हैं। ऐसे गुरु सदगुरु होते हैं। संसार में सुख- दुख अाते जाते हैं। सुख आता है तो उसके पीछे कई दुख भी लग जाते हैं। इसलिए संसार के सुख मेंढक की भांति कहे गए हैं। साधु जीवन सुखी जीवन होता है। जहां मोह, माया, लोभ, राग, द्वेष नहीं वहां सुख ही सुख है। सांसारिक जीवन में मनुष्य आवश्यकता से अधिक की चाहत रखता है, उसकी लालसा कभी खत्म नहीं होती है। जबकि साधु कभी आवश्यकता से अधिक नहीं चाहते।

यह बात शहर के राजेंद्र भवन बड़ा रावला में जैन मुनि हितेषचंद्रजी ने मंगलवार को धर्मसभा कर आराधकों से कही। मुनि के चातुर्मास प्रवचन और धार्मिक अनुष्ठानों के साथ हो रहा है। प्रतिदिन जिले समेत आसपास के क्षेत्रों से जैन अनुयाई महाराज के प्रवचन सुनने पहुंच रहे हैं।

मुनि ने आगे कहा कि धन संपदा किसी काम की नहीं है। मोह माया में उलझकर लोग भगवान को भूल रहे है। सत्संग से मन पवित्र होता है। कर्मों के सुख-दुख कर्म के अधीन है। लेकिन मानसिकता का सुख दुख हमारे हाथ में है। मुनि के साथ मोहनखेड़ा तीर्थ के आचार्य ऋषभचंद्रसूरीश्वरजी की आज्ञानुवृत्ति साध्वी किरणप्रभाश्रीजी, विमल यशाश्रीजी भी चातुर्मास चल रहा है। प्रतिदिन आराधक व तप तपस्वी अपनी आराधना में लीन है। कार्यक्रम में गुरुदेव की महाआरती का चढ़ावा पुण्यपाल राजेंद्र कुमार लब्धी सेठ परिवार धार ने चढ़ाया। महाआरती का भी लाभ लिया। प्रतिदिन बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचकर धर्मलाभ ले रहे हंै।

धार. गुरुदेव की महाआरती करते लाभार्थी परिवार।

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