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श्रीकांत पारीक | सीकर (राजस्थान)

3 वर्ष पहले
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1952 में सैनिक का निधन, प|ी के पास दस्तावेज नहीं थे, 64 साल बाद घर की सफाई में मिला सेना का लंचबॉक्स, उस पर लिखे नंबरों से रिकॉर्ड निकाला, अब ‌Rs.4 हजार पेंशन स्वीकृत


श्रीकांत पारीक | सीकर (राजस्थान)

एक सैनिक देश सेवा में अपने प्राणों की आहुति तक दे देता है लेकिन उसी सपूत के परिजन कभी-कभी पेंशन तक के मोहताज हो जाते हैं। क्योंकि कई बार सैनिक अपनी सेवा के दौरान अपने दस्तावेज तैयार नहीं रखते। राजस्थान में सीकर के ऐसे ही दो सैनिक परिवारों की कहानी, जिनके पास शहीद के कोई दस्तावेज मौजूद नहीं थे। इसलिए उनकी पेंशन भी शुरू नहीं हो सकी, लेकिन िकस्मत पलटी। उन्हीं सैनिकों के घरों में सामान से परिजनों को एेसी चीजें मिलीं जिससे सैनिक के रिकॉर्ड खंगालने में मदद मिली और परिवार की पेंशन शुरू हो सकी।

सीकर की राजकंवर को लंचबॉक्स ने दिलाई पेंशन

सीकर के श्रीमाधोपुर इलाके के कोटड़ी निवासी चुन्नीलाल सेना में थे। इन्होंने दूसरा विश्व युद्ध भी लड़ा। 31 दिसंबर 1950 को सर्विस पूरी कर वापस आ गए व 20 मार्च 1952 को उनका निधन हो गया। पेंशन के लिए उनकी प|ी राजकंवर सैनिक कल्याण बोर्ड पहुंचीं, लेकिन परिजनों के पास कोई दस्तावेज नहीं था। इसलिए पेंशन नहीं लगी। 64 साल बाद 2016 में सफाई के दौरान राजकंवर को चुन्नीलाल को सेना की तरफ से दिया गया लंचबॉक्स मिला। इस पर आर्मी नंबर मिले थे। तब रिकॉर्ड खंगाला गया और दिसंबर 2017 में Rs.4000 पेंशन शुरू हुई।

रक्षा पदक के आधार पर पेंशन मिल सकी

मंडावरा निवासी ईश्वरराम सेना से रिटायर होने के बाद वे खेती में जुट गए थे। 8 साल पहले उनका निधन हुआ। परिजनों के पास कोई दस्तावेज नहीं थे इसलिए पेंशन शुरू नहीं हो सकी। महार रेजीमेंट में ईश्वर सिंह ने 1965 की लड़ाई में भाग लिया था। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें रक्षा मेडल मिला। ईश्वरराम के पुत्र हरलाल ने बताया कि सेना से आने के बाद पिता को पेंशन तक भी नहीं मिली। न ही उनको पूर्व सैनिक होने के नाते कोई सुविधा मिल रही थी। पुराने मकान की सफाई के दौरान पिता को दिया गया एक पदक मिला। इस पर लिखे नंबर के सहारे अब उनकी प|ी भंवर देवी को पेंशन दिए जाने के लिए कवायद शुरू की गई है।

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