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भीतर की दिशा में जीवन जीने से ही मिलता है सत्य और आनंद

3 वर्ष पहले
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श्री एम संस्थापक, सत्संग फाउंडेशन, बेंगलुरू

कबीर प्राय: कस्तूरी मृग की कहानी सुनाया करते थे कि हिमालय के निचले इलाके में पाई जाने वाली प्रजाति का मृग सुगंध की तलाश में यहां-वहां भटकता है, जो विशेष मौसम में उसके शरीर से ही निकलती है। उसे यह अहसास ही नहीं होता कि खुशबू तो उसी के शरीर से आ रही है। मानव के साथ भी यही बात है। हम सत्य की तलाश में यहां-वहां भटकते हैं, जानते नहीं है कि यह हमारे भीतर ही मौजूद है। इसे समझकर भीतरी बदलाव लाना उस बाहरी बदलाव को अमल में लाने की कुंजी है, जो हम दुनिया में देखना चाहते हैं। ऐसे भीतरी बदलाव से मानव एकता को साकार किया जा सकता है।

ज़िंदगी को जीने के दो तरीके हैं : एक, आम ज़िंदगी, जिसमें हम अपनी इंद्रियों का अनुसरण करते हैं। दो, असाधारण जीवन,जिसमें हम अपनी समस्याओं का समाधान खोजने के लिए भीतर की ओर मूड़ते है। एक बार हमें यह समझ में आ जाए कि परब्रह्म हमारे भीतर ही है तो हमें सत्-चित्-आनंद का अनुभव होना शुरू हो जाता है। स्कूलों में हमें शिक्षकों व बच्चों को यह समझाना चाहिए कि वे अपने शरीर को चुस्त-दुरुस्त रखे, क्योंकि फिट बॉडी में ही फिट माइंड हो सकता है।

देने के सौंदर्य से बढ़कर रूपांतरकारी कुछ भी नहीं है। यह करुणा का मूल है। गुरु नानकदेव धुनी चंद नाम के धनी कंजुस को जानते थे, जो सिर्फ संपत्ति इकट्‌ठा करने के लिए ही जी रहा था। गुरु नानकदेव ने एक बार उसे एक सुई दी। वह चकरा गया। उन्होंने कहा, नानकदेव यह सुई क्यों दी? नानकदेव ने कहा, ‘इसे संभालकर रखना और मुझे तब लौटा देना जब स्वर्ग में हमारी मुलाकात होगी।’ धुनीचंद कहने लगा कि यह कैसे संभव है। मैं यह सुई वहां नहीं ले जा सकता। नानकदेव ने कहा, ‘यहीं तो मेरे पुत्र। जब एक सुई तक नहीं ले जा सकते तो संपत्ति का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करने की बजाय उसे क्यों इकट्‌ठी कर रहे हो?’

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