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शकर भावों की गिरावट रोकने के लिए कोटा प्रणाली तत्काल लागू करना जरूरी

3 वर्ष पहले
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शकर के भारी भरकम उत्पादन के बाद शकर भावों की गिरावट को रोकने का एकमात्र विकल्प यही है कि केंद्र सरकार कोटा प्रणाली लागू कर दें। जिससे भावों में अकल्पनीय आ रही मंदी को रोका जा सकेगा। भारतीय बाजारों में जिस गति से शकर के भाव गिर रहे हैं, उससे निर्यात संयोग और धूमिल होते जा रहे हैं। मिलों की आर्थिक स्थिति जर्जर होने लगी है। शकर मिलों में किसानों का अरबों रुपया अटक गया है, उसका भुगतान कैसे होगा यह चिंता मिलों को कम एवं केंद्र सरकार को अधिक सता रही है। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव हैं। उप्र, महाराष्ट्र और कर्नाटक में सर्वाधिक रुपया बकाया है। बाजार में धन की तंगी से ग्रस्त है। शीतलपेय वालों की मांग भी कम है। मिलें लगातार भाव घटाकर बेचवाली कर रही है। मिलों पर बैंकों के कर्ज अलग से है। उनके बारे में तो कोई विचार ही नहीं कर रहा है। बैंकों का भुगतान कैसे और कब होगा?

उपभोक्ता मांग कम

सरकार का मानना है कि उत्पादन में वृद्धि के बाद अधिशेष शकर को निर्यात करके ही कम किया जा सकता है और उसके लिए दो योजनाओं की घोषणा भी कर दी गई है। सामान्यत: शीतलपेय के अलावा वैवाहिक सीजन में शकर की खपत बढ़ जाया करती है, किंतु बाजारों में धन की तंगी की वजह से अधिकांश जिंसों में ग्राहकी कम है। जिसका प्रभाव शकर की मांग पर भी देखा जा रहा है। शकर सस्ती होने और बढ़ती जनसंख्या के बाद भी खेरची उपभोक्ताओं की मांग सामान्य से अधिक नहीं है। यही भी एक वजह है कि शकर के भाव घटे जा रहे हैं। शकर मिलों ने कोटा प्रणाली को आगे होकर समाप्त कराया था अन्यथा आज ये दिन शायद नहीं देखना पड़ते। जब तक कोटा प्रणाली लागू रही अधिकांश मिलों की बैंलेंस शीट घाटे में नहीं बनती थी। वर्तमान में मिलें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए भाव तोड़कर बेचवाली कर रही है। अब तो स्थिति यह बन गई है कि यह कल्पना करना कठिन हो गया है भाव कहां जाकर रुकेंगे। इतनी मंदी की तो आशा ही नहीं की गई थी।

बैसाखी पर उद्योग नहीं चलते

शकर उद्योग आखिर कब तक बैसाखी पर चलता रहेगा? इसके अलावा किसानों को भुगतान को लेकर सरकार की ओर मुंह करना भी उचित नहीं है। भुगतान करना उद्योग की जवाबदारी है। आखिर किसानों के नाम पर सरकार से सहायता की मांग कब तक करते रहेंगे। सरकार को गन्ना किसानों की चिंता क्यों है। देश में अनेक ऐसे किसान है जिनकी उपज बिना बिकी फेंकी जा रही है, ऐसे किसानों को सहायता की जाना चाहिए बजाय गन्ना उत्पादन करने वाले अमीर किसानों की। गन्ना किसानों को कीमत भी मनमानी चाहिए और रुपया भी पूरा चाहिए। यदि देश और विश्व में शकर कम भावों पर बिकेगी, तो गन्ना महंगे भावों पर क्यों खरीदा जाना चाहिए। गन्ने का उत्पादन कम होगा तो खाद्य तेलों के समान शकर का आयात भी कर लिया जाना चाहिए, जिसका सीधा लाभ आम उपभोक्ताओं को मिलेगा।

मिलों पर कार्रवाई करें

पिछले दिनों खाद्य मंत्री ने उप्र और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर कहा है कि किसानों को गन्ने की बकाया राशि का भुगतान शीघ्र कराया जाए। शकर उत्पादन में उप्र और महाराष्ट्र का 80 प्रतिशत योगदान है। खाद्य मंत्री ने पत्र में कहा है कि पिछले 3 वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने घरेलू शकर मिलों की स्थिति सुधारने के लिए कई कदम उठाए हैं। इसी वजह से शकर के भाव पिछले 1 वर्ष से कमोबेश स्थिर है। इस वजह से उद्योग को कमी की समस्या बाहर आने में मदद मिली है। पत्र में कहा गया है कि ऐसी मिलें जो किसानों को गन्ने का भुगतान नहीं कर रही हैं।

खाद्य मंत्रालय का सब्सिडी से इनकार
पिछले 2-4 दिन से यह खबर फैलाई जा रही थी कि केंद्र सरकार गन्ना उत्पादकों को 55 रुपए क्विंटल की सब्सिडी देने वाली है। हाल ही में खाद्य मंत्रालय ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार की ऐसी कोई योजना नहीं है। यह भी स्पष्ट किया गया है कि अधिशेष स्टॉफ को कम करने के लिए 20 लाख टन शकर निर्यात की अनुमति दे दी है। मिलों को निर्यात करना चाहिए, किंतु ऐसा आभास होता है कि शायद ही कोई मिलें 6-7 रुपए किलों का घाटा उठाकर निर्यात करने का प्रयास करेगी। केंद्र सरकार ने पिछले दिनों निर्यात पर शुल्क शून्य कर दिया है।

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