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पारिवारिक मामलों की सुनवाई सीडब्ल्यूसी करे : परमार

3 वर्ष पहले
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पारिवारिक मामलों की सुनवाई का अधिकार बाल कल्याण समिति को मिलेगा तो न्यायालय का बोझ होगा कम और बच्चों की अच्छे से देखभाल हो सकेगी।

यह प्रस्ताव बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार ने हाईकोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता के सामने रखा है। जोधपुर में राजस्थान स्टेट जूडिशियल अकादमी में प्रशिक्षण के दौरान बाल संरक्षण के मुद्दों पर चर्चा करते हुए अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार ने बताया कि परिवार न्यायालय में कई मामले लंबित रहते हैं और न्यायालयों पर इसका बोझ भी है। ऐसे मामलों में पति और प|ी के बीच अनुबन होने के कारण जब तक कोर्ट फैसला नहीं देती है, तब तक बच्चों को संरक्षण और पोषण की काफी आवश्यकता होती है। ऐसे में पति-प|ी बच्चों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं और बच्चे मां-बाप के होते हुए भी बेसहारा जैसी जिंदगी जीते हैं। क्यों न ऐसे विवादों में बाल कल्याण समिति को अधिकार दिए जाएं, ताकि इस प्रकार के मामलों की सुनवाई बाल कल्याण समिति में भी की जा सके और न्यायालयों के मुकदमों का भार भी कम किया जा सके। हाईकोर्ट के न्यायाधीश संदीप मेहता ने सकारात्मक रूख दिखाते हुए अध्यक्ष से पूरी जानकारी में ली।

प्रस्ताव

धौलपुर बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष ने हाईकोर्ट के न्यायाधीश के सामने दिए प्रस्ताव

बाल गृहों में असहाय बच्चों को कौशल विकास योजना से जोड़ने का भी प्रस्ताव रखा

बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष बिजेंद्र सिंह परमार ने यह भी प्रस्ताव रखा कि बाल गृहों में रह रहे ऐसे बच्चे जिनकी उम्र 14 व 15 साल है और वे असहाय हैं तो ऐसे बच्चों के लिए कौशल विकास योजना विकसित की जाए। ताकि वे 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने के बाद बाल गृह से बाहर आए तो इस प्रकार का कोई प्रमाण-पत्र व हुनर हो, ताकि वे अपना स्वरोजगार विकसित कर सके और अपना जीवन यापन कर सामाज की मुख्य धारा में जुड़ सके।

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