पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

डाउनलोड करें
  • Hindi News
  • National
  • आपातकाल में समझी लोगों की पीड़ा, दूसरों से मदद लेकर खोला नेत्र अस्पताल, 15 हजार लोगों को दी रोशनी

आपातकाल में समझी लोगों की पीड़ा, दूसरों से मदद लेकर खोला नेत्र अस्पताल, 15 हजार लोगों को दी रोशनी

3 वर्ष पहले
  • कॉपी लिंक
आपातकाल में समझी लोगों की आंखों की पीड़ा, प्रचारक रहते बनाई योजना, दूसरों से मदद लेकर नेत्र हॉस्पिटल खोला। अब तक 15 हजार लोगों को रोशनी दी। जीहां, यह कहानी डूंगरपुर शहर से 15 किमी उदयपुर मार्ग पर वागदरी गांव में आपातकाल के दौरान शुरू होती है। संघ के प्रचारक रहे मूलचंद लोढ़ा आपातकाल के दौरान डूंगरपुर और बांसवाड़ा में प्रचारक थे।

उस समय इमरजेंसी लगी हुई थी। धरपकड़ भी चल रही थी। ऐसे में ये आदिवासी क्षेत्र के गांवों में भ्रमण करते थे। इस दौरान लोगों की आंखों की तकलीफ को समझने का मौका मिला और पाली में संचालित एक हॉस्पिटल संचालक से मदद मिली। आखिर डूंगरपुर के वागदरी में नेत्र अस्पताल खोला। अब तक इस हॉस्पिटल के माध्यम से 15 हजार लोगों की आंखों के सफल ऑपरेशन हो चुके हैं और इन लोगों को रोशनी मिल चुकी है। जागरण जनसेवा मंडल का गठन कर 14 साल पहले इस अस्पताल की नींव डाली थी। साल 2003 में वागदरी में नि:शुल्क नेत्र चिकित्सा शिविर शुरू हुआ। तब यहां नंगी और वीरान पहाड़ियां थी। पाली और बिशनपुर में आंखों के इलाज के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था कौरव नेत्र यज्ञ समिति के संपर्क में लोढ़ा पहले से ही थे। संचालक राजमल जैन से उन्होंने वागदरी में शिविर लगाने की मंशा जताई। तब वहां से विशेषज्ञ डॉक्टर लाकर शिविर लगाकर लोगों की जांच की। जब लोढ़ा ने यहां पर हॉस्पिटल खोलने की मंशा जाहिर की तो 31 लाख रुपए की मदद राजमल जैन पाली ने दी। बाद में भामाशाह, सरकार से मदद जुटाकर अब करोड़ों रुपए का हॉस्पिटल है। यहां निशुल्क आंखों के ऑपरेशन, अनाथालय और स्कूल का संचालन हो रहा है।

शहर से 15 किमी दूर वागदरी में खोला अस्पताल

मंडे पॉजिटिव

मूलचंद लोढ़ा

डूंगरपुर। मोतियाबिंद का ऑपरेशन कर घर लौटते लोग।

इमरजेंसी में पीएम मोदी के साथ जुड़े

बांसवाड़ा के प्रचारक मनफूल दयाल को पुलिस ने जेल में बंद कर दिया था। ऐसे में संघ ने बांसवाड़ा की जिम्मेदारी भी उन्हें सौंप दी थी। संघ उस समय राष्ट्रीयता के जनजागरण के लिए चिंगारी नाम की पत्रिका का प्रकाशन करता था। संपादन उदयपुर में लक्ष्मीनारायण जोशी करते थे। पुलिस ने उन्हें भी कंपोजिंग मशीन के साथ गिरफ्तार कर लिया था। ऐसे में पत्रिका का प्रकाशन मुश्किल हो गया था। प्रकाशन की प्रक्रिया उस समय अहमदाबाद में होती थी। मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उस समय अहमदाबाद महानगर प्रचारक हुआ करते थे। वे उनसे वहीं एक जैन धर्मशाला में मिलते थे। लोढ़ा को बताया गया था कि एक संकेत धर्मशाला के मैनेजर को देंगे तो छापी हुई पत्रिकाएं उन्हें सौंप दी जाएंगी। तब से लोढ़ा मोदी के लगातार संपर्क में बने रहे। संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह रज्जू भैया डूंगरपुर आए और महा रावल से मिलकर जनता पार्टी में शामिल होने के प्रयास किए थे।

डूंगरपुर लौटकर पहले मझोला और फिर वागदरी को बनाया केंद्र

स्वतंत्र सेवा कार्य के लिए अपने पुराने क्षेत्र डूंगरपुर लौट आए। जहां आने-जाने की सुविधा तक नहीं थी। ऐसे मझोले गांव में सेवा फिर से शुरू की। अनाथ बच्चों के लिए आश्रम खोला। निरक्षर लोगों में डर था कि वे बच्चों को पढ़ा लिखाकर साथ ले जाएंगे। धीरे-धीरे विश्वास जमाया, बच्चों के लिए प्राथमिक स्कूल खोला। जिसे बाद में शिक्षा मंत्री रहे गुलाबचंद कटारिया ने यूपीएस स्तर पर क्रमोन्नत कराया। बाद में अस्पताल और पूरा परिसर बनाने के लिए जगह की जरूरत पड़ी तो तत्कालीन कलेक्टर अखिल अरोडा और वागदरी सरपंच पूंजीलाल डामोर ने 15 बीघा जमीन दिलाई। इसी 15 बीघा जमीन पर आज आचार्य महाप्रज्ञ नेत्र अस्पताल, अनाथ आश्रम, खुद का स्कूल, भोजनशाला, यज्ञशाला संचालित हो रहे। स्कूल और अनाथालय में भारतीय संस्कारों का पोषण परंपरागत गुरुकुल शिक्षा और धर्म प्रचार के साथ किया जा रहा है।

आगे क्या

वर्तमान में मूल रूप से मोतियाबिंद बीमारी के ही ऑपरेशन किए जाते हैं। उनकी मंशा है कि आंखों से जुड़ी रेटिना, अंधापन, मधुमेह से जुड़ी आंखों की समस्या, मुड़ी हुई पलकें, ग्लूकोमा, कम दृष्टि, यूवाइटिस की जांच और ऑपरेशन की सुविधा शुरू करने का सपना है। ऑपरेशन के लिए बाहर से डॉक्टर बुलाने पड़ते हैं। अस्पताल के लिए नियमित डॉक्टर का बंदोबस्त करना है। उनके साथ सालों से सेवा कार्य में जुड़े हरीश परमार, मगन पटेल, पंकज घोघरा इन तमाम गतिविधियों का संयोजन करते हैं।

संघ ने अकाल के समय देखा समर्पण...

अकाल के समय जगह-जगह चारा डिपो खोले गए। उनकी सेवा भावना को देखकर क्षेत्रीय प्रचारक सोहन सिंह ने संघ का सेवा भारती नाम का प्रकल्प बनाकर पूरे प्रदेश की जिम्मेदारी दे दी और जयपुर बुला लिया। वहां काम करने के बाद उन्हें लगा कि बड़े शहरों में सभी व्यवस्थाएं हैं, ऐसे में पिछड़े क्षेत्रों में सेवा की जाए।

खबरें और भी हैं...