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बिना मंजूरी रात को चल रही माइंसंे, खतरे में मजदूरों की जान

3 वर्ष पहले
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डचकी के ओमेगा मार्बल माइंस में एक मजदूर की मौत हो गई। इसे विभागीय अफसर एक हादसा बता रहे हैं, लेकिन हकीकत में मार्बल माइंस मालिकों की ओर से करोड़ों की कमाई के लिए मजदूरों की जान को खतरे में डालकर बिना सुरक्षा के अवैध तरीके से करवाया जा रहा खनन है।

इसकी वजह है अगले एक महीने बाद ही बारिश का दौर शुरू होगा और इन माइंसों में पानी भर जाएगा। उन दिनों में माइंस में खनन भी बंद हो जाएगा, जिससे माइंस मालिकों को नुकसान होगा। लेकिन इस नुकसान से बचने के लिए माइंस मालिक रात-दिन इन खदानों से अवैध तरीके से खनन कर रहे हैं, जिसके लिए उनके पास न तो किसी तरह की मंजूरी है और न ही सुरक्षा मापदंडों को पूरा कर रहे हैं। जिले में कुल 144 माइंस हैं, जिसमें से करीब 80 मार्बल माइंस हैं। इसमें से आधी माइंसों में अवैध तरीके से रात के समय भी खनन किया जा रहा है। इन खदानों पर रात के समय मजदूर बिना पर्याप्त रोशनी और सुरक्षा के ही काम कर रहे हैं, लेकिन इन नियमों की पालना करवाने वाले खनन विभाग और खान सुरक्षा विभाग आंखें मूंदकर बैठे हुए हैं। अब तक रात के समय खनन की बिना मंजूरी के चल रही इन माइंसों पर किसी तरह की कोई कार्रवाई तक नहीं की गई है।

डूंगरपुर. करीब 200 फीट गहरी मार्बल माइंस और उसके आसपास पड़ा वेस्ट।

बारिश से पहले जितना मार्बल निकाला उतना फायदा, 4 महीने माइंसें बंद

जिले में 15 जून के बाद मानसून माना जाता है, लेकिन बारिश जुलाई तक ही आती है। ऐसे में मार्बल माइंस मालिकों के पास करीब एक से डेढ़ महीने का समय है। माइंस में पानी भर जाने के बाद इसमें खनन संभव नहीं। ऐसे में बारिश के 4 से 5 महीनों में खनन बंद हो जाएगा। यही कारण है कि माइंस मालिक बारिश से पहले ही जितना हो सके उतना मार्बल ब्लॉक की कटिंग कर निकाल लेना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने कई बड़ी डील भी कर ली है, जिसे पूरा करने के लिए मजदूरों को दिन के साथ ही अब रात काम करवाया जा रहा है, जहां मजदूरों की जान भी खतरे में डाल रहे है।

नियम- रात के समय खनन से पहले खान सुरक्षा विभाग से अलग से मंजूरी लेना जरूरी

हकीकत- जिले में किसी भी माइंस के पास रात की मंजूरी नहीं, 200 से 300 फीट गहरी खदानों में रोशनी के लिए 2 से 3 लाइटें ही

करीब 200 फीट से ज्यादा गहरी माइंसंे, रोशनी चिमनी के जैसी

जिले में कई माइंस 200 फीट से ज्यादा गहरी हो गई है। उन माइंस में भी रात के अंधेरे में खनन हो रहा है, जहां रोशनी को लेकर इंतजाम नहीं के बराबर है। 2-3 हैलोजन की लाइट लगाकर मजदूरों को इन गहरी खदानों में उतारा जाता है। मजदूर करीब 200 फीट गहरी खान में उतरकर मशीनों से मार्बल ब्लॉक की कटिंग करते है। उस समय चिमनी जैसी ही रोशनी दिखती है और मजदूर काम करने को मजबूर रहते है। दो दिन पहले डचकी में हुआ हादसा भी इसी की वजह है। जबकि रात के समय माइंस में खनन के लिए खान सुरक्षा विभाग से मंजूरी लेना जरूरी है और इसके लिए विभागीय टीम सुरक्षा और रोशनी के इंतजामों का निरीक्षण करने के लिए आने के बाद ही मंजूरी दी जाती है। लेकिन यहां मंजूरी तो दूर सुरक्षा के इंतजाम तक नहीं किए जाते है।

सुरक्षा के इंतजाम में हमारी माइंसंे फेल

सुरक्षा के इंतजामों में हमारे जिले की माइंसें पूरी तरह से फेल हैं। माइंसों पर काम करने वाले मजदूरों की सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी जरूरत हेलमेट, लाइफ जैकेट, गमबूट, मास्क, हाथ ग्लब्स बहुत ही जरूरी है। रात के समय काम करने वाले मजदूरों के लिए लाइट लगे हेलमेट की जरूरत होती है, लेकिन यहां तो साधारण हेलमेट तक नसीब नहीं है। हादसे के दिन जब मजदूरों से पूछा गया था तब बताया था कि माइंस पर उनके कामकाज का किसी तरह का रिकॉर्ड तक नहीं है। ऐसे में कौन मजदूर काम कर रहे है, इसका कोई रजिस्टर नहीं रहता है। माइंस पर काम करने वाले मजदूरों का श्रम विभाग से पंजीयन के साथ ही उनके पीएफ की कटौतियां, इंश्योरेंस भी होना चाहिए, लेकिन यह सुविधाएं भी नहीं दी जाती है। जिले के किसी भी माइंस के चारों ओर परकोटा या तार की फैंसिंग तक नहीं की गई है, जबकि यह सबसे पहले जरूरी है ताकि कोई अचानक इन खदानों में नहीं गिरे।

जहां मर्जी हुई वहीं बना दिया डंपिंग यार्ड

माइंस पर निकलने वाले वेस्ट को लेकर जगह तय होती है, लेकिन यहां माइंस पर खनन के नियमों की पालना ही नहीं होती तो डंपिंग के नियमों को देखने वाला तो बिल्कुल भी कोई नहीं है। यहीं कारण है कि माइंसों की ओर से मनमर्जी से डंपिंग यार्ड बना लिए गए है। माइंस से ज्यादा आसपास के बड़े इलाके में ही माइंस का वेस्ट फैंक दिया जाता है। कई नदी-नालों की जगह पर भी वेस्ट फेंका जाता है, लेकिन इनकी जांच कर कार्रवाई करने वाले अधिकारी ही मौन है।

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