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हादसे वाली माइंस को 9 साल पहले बंद करने के आदेश हुए, अफसरों ने फिर शुरू करवा दी

3 वर्ष पहले
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डचकी के ओमेगा मार्बल माइंस पर हुए हादसे में एक मजदूर की जान जाने के बाद खदानों पर किस तरह से खनन नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही है, इसकी पोल खोल दी है। जिस माइंस में हादसा हुआ था, उस माइंस को नियमों की पालना नहीं करने के कारण 9 साल पहले ही बंद करने के आदेश दे दिए गए थे, लेकिन इसके 5 महीने बाद ही अफसरों ने इसे फिर से शुरू करा दिया। यही कारण है कि बुधवार रात को बिना मंजूरी के ही रात के अंधेरे में खनन किया गया और एक हादसे में मजदूर की जान ले ली।

जिले में 144 खनन पट्टे हैं और करीब 150 हेक्टेयर खनन क्षेत्रफल हैं। इन खानों में सबसे ज्यादा 80 माइंस मार्बल की है। इसके अलावा करीब 38 सोप स्टॉन, 12 मेसेनरी स्टॉन, 12 बलवाड़ा पत्थर, 2 मेजर फ्लोराइड की माइंस हैं। इन खदानों में खनन के साथ ही उनके यहां सभी तरह के मापदंड की जांच के लिए खनिज विभाग, खान सुरक्षा अधिकारी, श्रमिक नियमों की पालना के लिए श्रम विभाग के अफसर जिम्मेदार हैं, लेकिन कोई भी अफसर इसकी जांच के लिए आते भी हैं तो वह सिर्फ खानापूर्ति के बाद ही चले जाते हैं और फिर नियम खुलेआम तोड़े जाते हैं। करोड़ों रुपए की कमाई वाली इस माइंस के बावजूद सुरक्षा इंतजाम के नाम पर कोई साधन सुविधा नहीं है।

ओमेगा मार्बल माइंस : खान विभाग की रिपोर्ट में माना नहीं होती पालना : हादसे के बाद खनिज विभाग के अफसरों की ओर से निरीक्षण में भी माना गया है कि माइंस पर कई तरह के नियमों की पालना नहीं हो रही थी। खान पर कोमुस्टो मशीन खराब पड़ी थी, जबकि किसी भी हादसे के वक्त पत्थर को हटाने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है। डेढ़ हेक्टेयर में फैली इस माइंस के ऑफिस में कोई रिकॉर्ड नहीं था, जबकि माइंस पर काम करने वाले हर मजदूर का पूरा ब्यौरा होना जरूरी होता है। माइंस पर करीब 40 से ज्यादा मजदूर काम करते हैं, लेकिन सुरक्षा इंतजाम को देखें तो केवल 4 हेलमेट ही थे। सुरक्षा जैकेट, गमबुट, मास्क, पपर प्लग जैसे कई उपकरण नहीं थे। रात के समय माइंस में खनन किया जा रहा था, उसकी मंजूरी भी खान सुरक्षा विभाग से नहीं ली गई थी। पर्याप्त रोशनी के इंतजाम नहीं थे। केवल 3 हेलोजन की रोशनी से ही 150 फीट गहरी माइंस में नियम तोड़कर खनन किया जा रहा था। खनिज विभाग की ओर से यह रिपोर्ट बनाकर कलेक्टर और खनन विभाग के बड़े अफसरों तक पहुंचाई जाएगी।

6 साल से क्षेत्र में अफसर निरीक्षण करने ही नहीं गए

डूंगरपुर। डचकी में माइंस जहां एक दिन पहले हादसा हुआ।

हकीकत यह : खनिज अफसरों ने जुलाई 2012 के बाद से कोई निरीक्षण ही नहीं किया, जितने क्षेत्र में खनन की मंजूरी, उससे कई गुना ज्यादा क्षेत्र में हो रहा खनन

दिसंबर 2008 में खान बंद करने के आदेश हुए, मई, 2009 में फिर बहाल

यहां नियम 1997 में माइंस शुरू होने के बाद से ही तोड़े जा रहे हैं। 29 दिसंबर 2008 को तत्कालीन खनिज इंजीनियरों ने नियमों की पालना नहीं करने पर माइंस को बंद करने के आदेश दे दिए गए थे, लेकिन 5 महीने बाद ही अफसरों ने माइंस पर सबकुछ सहीं मान लिया और 5 मई, 2009 को फिर से खान को शुरू करने के आदेश दे दिए गए।

लापरवाही : जुलाई, 2012 के बाद से निरीक्षण तक नहीं

जिले के खनिज अधिकारियों के पास 144 खनन पट्टे होने के बावजूद इतने व्यस्त हैं कि 16 जुलाई 2012 को आखिरी निरीक्षण के बाद से उन्हें निरीक्षण के लिए समय तक नहीं मिला। यानी पूरे 6 साल तक किसी भी खनिज अधिकारी की ओर से हादसे वाली ओमेगा मार्बल माइंस का निरीक्षण ही नहीं किया है, जिस कारण यहां माइंस पर कितनी गड़बड़ियां चल रही है, इसका पता भी नहीं लगा या लगने के बाद भी कार्रवाई से मालिक को बचाने के लिए अफसर बचते रहे।

डचकी में 7 से ज्यादा माइंस, 3 के मालिक एक ही

डचकी गांव में करीब 7 अलग-अलग माइंस हैं, इनमें 3 माइंस के मालिक एक ही हैं। इसमें ओमेगा मार्बल माइंस, श्रीचंद जैन मार्बल माइंस और जैन मार्बल माइंस हैं। इसके मालिक श्रीचंद जैन हैं। इसके अलावा 4 माइंस और भी हैं।

हादसे वाली माइंस को लेकर पूरी रिपोर्ट तैयार कर ली है। खनन को लेकर कई नियमों को तोड़ा जा रहा था। इसकी रिपोर्ट बनाकर कलेक्टर और निदेशालय खान सुरक्षा को भी भेजी जा रही है।\\\'\\\' कांतिलाल परमार, सहायक खनिज अभियंता डूंगरपुर

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