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मानव जीवन मूल्यवान, मनुष्य में विद्यमान रहती है अच्छाई व बुराई

3 वर्ष पहले
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मानव जीवन मूल्यवान है, मनुष्य में अच्छाई व बुराई दोनों विद्यमान है। यदि हमें अपने जीवन को स्वर्ग बनाना है तो हमें अच्छाइयों को अपनाना होगा और बुरी बातों को त्यागना होगा। तभी हमारा जीवन स्वर्ग बन सकता है। यह उदगार शंका समाधान के प्रेरणता मुनि प्रमाणसागर ने दिगबर जैन मुनिसुव्रतनाथ जिनालय के संत भवन में धर्म सभा को सबोधित करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि मनुष्य को परनिन्दा नकारात्मक सोच का परिणाम है। कुछ मनुष्यों में परनिंदा की प्रवृत्ति होती है। अच्छा इंसान दूसरों के गुणों को देखता है। अच्छाई व बुराई हमारे अंदर है। दूसरों के घरों में झाडू लगा देने से अपने स्वयं के घर में सफाई नहीं होती है। मुनि ने कहा कि दूसरों की बुराई सुनना, देखना या करना या बुरा सोचना यह निंदा का कारण है। उन्होंने कहा कि हमें गुणानुवदी दृष्टि रखना चाहिए व दूसरों की प्रशंसा की आदत डालनी चाहिए। आप अपने आप को बदलें। मनुष्य व्यवहार व प्रैक्टिकल में अपने जीवन को सुखमय बना ले, क्योंकि आप का जीवन बहुमूल्य है। इस अवसर पर बड़े बाबा एवं आचार्य श्री के चित्र का अनावरण किया गया।

धर्म-समाज-संस्था

प्रवचन करते मुनि प्रमाणसागर

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