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25 देशों में हुनर दिखा रहे डूंगरपुर के सोमपुरा समाज के 250 शिल्पकार

3 वर्ष पहले
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वेंबली लंदन में वल्लभ संप्रदाय के मंदिर का गुंबज जमाते हुए।

बद्रीनाथ से लेकर लंदन, फ्रांस, सउदी अरब, कुवैत, अमेरिका जैसे देशों में कर रहे हैं अपनी कला का प्रदर्शन

पुनीत चतुर्वेदी | डूंगरपुर

शहर और जिले के विभिन्न गांवों में रहने वाले सोमपुरा समाज के 250 शिल्पकारों ने अपनी बेजोड़ कला का प्रदर्शन पिछले कई सालों से बद्रीनाथ से लेकर लंदन तक अरब देशों से लेकर अमेरिका तक करीब 25 देशों में किया है। एक पत्थर को चाहे वो कितना भी बदरंग हो, खुरदरा हो, लेकिन अपनी सोच, समझ और कला के दम पर उसका स्वरूप बदलकर किसी भगवान की मूर्ति, किसी मंदिर का गुंबज, या फिर किसी मस्जिद की बारीक कारीगरी में ढाल देते हैं।

शहर में सोमपुरा शिल्पकारों का एक समाज बसता है। भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद इस समाज में जन्म लेने वाले हर शख्स पर इतना ज्यादा है कि उसकी शिल्पकला के प्रमाण देश और विदेशों की धरती पर मील के पत्थर के रूप में स्थापित है। शहर के पातेला तालाब के पास पुराने शहर में एक समाज बसता है। बेहद सादगी से जीने वाले इस समाज के वाशिंदे अपनी बेजोड़ कारीगरी के लिए जाने जाते हैं। गांधीनगर गुजरात का जीर्णोद्धार कर बनाया गया गुजरात सोमनाथ ज्योतिर्लिंग शिवालय, दिल्ली, जयपुर और मध्यप्रदेश के नागदा शहर में बने बिरला मंदिरों की शृंखला समाज के पुरखों की प्रतिभा का प्रमाण है।

बीच में कुछ समय रहा जब युवा अपनी धरोहरी प्रतिभा को भूलकर रोजगार के विकल्प तलाशने निकले थे। अब फिर से शिल्पकला से वे युवा भी जुड़े हुए हैं जो महंगी तकनीकी शिक्षा ले चुके हैं। अधिकांश स्नातक और पीजी तक की पढ़ाई करते हुए इस काम में जुटे हैं। कई आईटीआई करने के बाद भी परंपरागत गृह उद्योग को आगे बढ़ा रहे हैं। समाज के राजेश पुत्र कांतिलाल ने बताया कि उन्होंने 1993 तक पढ़ाई पूरी कर ली थी, लेकिन समय मिलते ही मामा के घर जाता। वहां उनको देखकर ललक जगी, काम सीखा।

डूंगरपुर की गोद में निकलने वाले पारेवा पत्थर से लगाकर हर किस्म के पत्थर की बेजोड़ शिल्पकारी के लिए है ख्यातनाम

स्वामीनारायण संस्था ने दिलाई पहचान

1994 के पास शहर में आईटीआई के पास एक कारखाना स्वामीनारायण संस्था की मूर्तियां बनाने के लिए शुरू किया। हर साल करोड़ों रुपए के शिल्प यहां तब से अब तक बनते आ रहे हैं। शिल्पकला सीख चुके कलाकार यहां काम करते हैं। विदेश ले जाने के लिए पैकिंग कर उन्हें कांडला बंदरगाह पहुंचाया जाता है। यहां कारखाने में काम करने वालों की कृतियां पसंद आने पर विशेषज्ञ शिल्पकार स्थानीय कलाकारों को अपने साथ विदेशों में बन रहे मंदिर, मस्जिदों के निर्माण के लिए ले जाते हैं। राजेश ने बताया कि 1994 में वे भी ब्रिटेन के नेसडन में स्वामीनारायण मंदिर निर्माण की टीम में गए थे। उनके साथ 8 जनों की टीम ने 5 माह तक वहां काम किया। राजेश बताते हैं कि हाल ही बेंगलूरू में हुए इंटरनेशनल स्टोन फेस्टिवल में भी वे अपनी कृतियों के साथ शामिल हुए थे। शहर के राजेंद्र सोमपुरा बर्फबारी से ढके पहाड़ों में बद्रीनाथ धाम पर मंदिर के जीर्णोद्धार का काम कर चुके हैं।

दुनियाभर में धाक : सबसे पहले बुलाए जाते हैं यहां के शिल्पकार

अहमदाबाद में वल्लभ संप्रदाय के मंदिर बनाने वाले कारखाने में एक परीक्षा पास करने के बाद एक दल लंदन गया। लंदन के वेमली क्षेत्र में सनातन हिंदू मंदिर के निर्माण के लिए 10 साल तक काम किया।

साल 2014 में तैयार हुए न्यू जर्सी के स्वामीनारायण मंदिर के निर्माण में भी यहीं के शिल्पकारों ने कारीगरी दिखाई।

बर्मिंघम में जब 7 साल से कृष्ण मंदिर का काम बंद पड़ा था तो फिर यहीं से शिल्पकार गए। उन्होंने एक साल रुककर पूरा मंदिर तैयार किया।

लंदन के ही बेफर्ड मुस्लिम बहुल क्षेत्र में डूंगरपुर के अप्रवासी भारतीय सज्जाद भाई कोचीन में रहते थे। वे डूंगरपुर के शिल्पकारों की कारीगरी को पहचानते थे। मस्जिद निर्माण में भी यहां के शिल्पकारों का योगदान रहा।

डूंगरपुर के पारेवा पत्थर ने दिया कला को जन्म

शहर और आसपास के गांवों में एक विशेष तरह का पारेवा पत्थर खदानों से निकलता है। यह पत्थर निकाले जाते समय तो काफी नरम होता है, लेकिन धीरे-धीरे कठोर हो जाता है। ये परिवार इन्हीं पत्थरों से शिल्पकला सीखते आए।

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