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बुराइयों को त्याग सेवा और सत्संग करना चाहिए : चावला

3 वर्ष पहले
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शनिवार को निरंकारी सतसंग भवन फिरोजपुर छावनी में सतगुरु माता सविन्दर हरदेव महाराज की कृपा से एक विशाल निरंकारी संत समागम करवाया गया। इसमें लुधियाना से विशेष तौर पर पहुंचे जोनल इंचार्ज एचएस चावला ने प्रवचन कर प्रभु भक्ति का मार्ग दिखाया।

यह समागम बैसाखी के त्योहार पर हर वर्ष की तरह इस बार भी सिमरतपाल के जन्मदिवस पर उनके परिवार की तरफ से करवाया गया। जिसमें दूर दूर से श्रद्धालुओं ने भाग लिया। जोनल इंचार्ज चावला ने परिवार को सिमरतपाल के जन्मदिन की बधाई देते हुए कहा कि यह मानव जीवन दुर्लभ है जो कि प्रभु परमात्मा की प्राप्ति के लिए मिला है। मानव को इंसानी रूप में आने के असली मकसद को समझते हुए इस निरंकार रूपी अहंकार और सामाजिक बुराइयों को त्याग कर सेवा, सिमरन, सत्संग करना चाहिए। समारोह में निरंकारी मिशन के भक्त कलाकारों कमल करतार, कश्मीर सिंह आदि ने संगीत के माध्यम के साथ अपनी हाजिरी लगवाई।

इस अवसर पर लुधियाना से बाऊ हंस राज, मलेरकोटला के प्रमुख महात्मा सेवा सिंह, धर्मकोट से प्रेम सिंह, तलवंडी से दर्शन कंडा, गुरु हर सहाए से विजय कुमार, फाजिल्का से राजिन्दर कटारिया, जीरा से सुभाष, चरनजीत सादिक, अमृतसर से अमर सिंह, सूबेदार अवतार सिंह संधू, बाघापुराना से डा. लूथरा, खरड़ से बलवंत सिंह, लक्की मोगा, मलकीत सिंह मिशरीवाला, हरप्रीत सिंह बटाला, सुखदीप सिंह भिक्खीविंड, बहन अंजू फतेहगढ़ चूड़ियां, नवदीप शर्मा, महेंद्र सिंह क्षेत्रीय संचालक आदि उपस्थित थे। गुरु का अटूट लंगर भी बांटा गया।(नरेश कुमार)

निरंकारी संत समागम में सतसंग सुनते श्रद्धालु।

जो लीक से हटकर कुछ करते हैं वे समाज में चमक जाते हैं : साध्वी

मुक्तसर|दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से स्थानीय विशाल नगर में सत्संग सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर शिष्या साध्वी कात्यायनी भारती ने कहा कि दरअसल जिंदगी को व्यतीत करने और जीने में अंतर है, शायद इस फर्क से ही जीवन कला का जन्म होता है। आम भाषा में कहे तो जन्म के बाद मिले आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक हालात में जीना या फिर इन्हें अपने अनुसार बदलने की कोशिश करना। कुछ लोग इस कोशिश को जीवन कला का नाम देते है क्योंकि बहुत से लोग लकीर के फकीर होते हैं, परन्तु जो लोग लकीर से हट के कुछ करते हैं वह समाज में चमक जाते हैं, परंतु दोनों हालातों में वह जीवन व्यतीत ही करते है। हां उनके ढंग में फर्क जरूर होता है। पर कुछ लोग सोचते हैं कि मानव जन्म लेता है और फिर मर जाता है ऐसा क्यों हो रहा है ? इसके पीछे क्या कारण है ? जो ऐसा सोचते हैं उनके अंदर जीवन को समझने की लालसा पैदा होती है जो सच के साथ मिलवाने व जीवन कला को प्राप्त करने का साधन बनती है। उन्होंने कहा कि जीवन कला के सही अर्थों को जानने के लिए जिंदगी के मनोरथ को समझना जरूरी है जिस का सही और सटीक उत्तर केवल पूर्ण गुरु द्वारा ही मिल सकता है।(अमित अरोड़ा)

साध्वी भारती।

दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के समागम में प्रवचन उपस्थित श्रद्धालु।

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